अक्षय तृतीया, आषढ़ शुक्ल नवमी, देव प्रबोधिनी एकादशी, चैत्र शुक्ल नवमी (राम नवमी) आदि ऐसे मुहूर्त हैं, जिनमें तारा अर्थात शुक्र और गुरु के उदय तथा अस्त पर विचार करना जरूरी नहीं होता।
वैदिक परंपरा के अनुसार पति-पत्नी का संबंध प्रेममय, स्थायी एवं संतति सुख से पूर्ण हो, इसीलिए यह संस्कार शुभ माह, दिनों एवं मुहूर्त में ही करने का विधान है। विवाह संस्कार के लिए वैशाख, ज्येष्ठ, आषढ, मार्गशीषर्, माघ एवं फाल्गुन मास शुभ माने गए हैं। चैत्र एवं पौष जैसे सौर मासों में विवाह नहीं किया जाता है।
कार्तिक तुला के सूर्य में प्रबोधिनी एकादशी के पहले और फाल्गुन कुंभ के सूर्य में होली से आठ दिन अर्थात होलाष्टक में विवाह नहीं किया जाता है। तिथियों में चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी और अमावस्या वर्जित तथा शेष तिथियां शुभ होती हैं।
वर-कन्या की जन्म अथवा नाम राशि के अनुसार त्रिबल शुद्धि - सूर्य, चंद्र एवं गुरु पर आधारित विवाह मुहूर्त ही जीवन सुखमय बनाने में समर्थ होते हैं। लड़के की जन्म राशि से 3, 6, 10, 11वें सूर्य शुभ 1, 2, 5, 7, 9 वें सूर्य पूज्य 4, 8, 12वें सूर्य त्याज्य होते हैं।
कन्या को 1, 3, 6, 10वें गुरु साधारण पूज्य एवं 4, 8, 12वें गुरु विशेष रूप से अच्छे रहेंगे। आश्विन मास में वृष, सिंह, कन्या, मकर और मीन राशि वाले लड़कों के सूर्य पूज्य रहंेगे। कार्तिक में मेष, मिथुन, कन्या, तुला, धनु और कुंभ राशि वाले लड़के के सूर्य पूज्य रहेंगे। मार्गशीर्ष में वृष, कर्क, कन्या, तुला, वृश्चिक और मीन राशि वाले लड़कों के सूर्य पूज्य रहेंगे।
कन्याओं में मेष, वृष, मिथुन, सिंह, तुला, वृश्चिक, मकर, कुंभ राशि वालों को मकरस्थ गुरु की पूजा-दान आदि करवाना चाहिए। मकर में स्थित गुरु कर्क, कन्या, धनु व मीन राशि के लिए शुभ रहेगा। दिसंबर माह में कुंभ का गुरु वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, धनु, कुंभ एवं मीन राशि वाली कन्याओं के लिए बाधाकारक हो सकता है, अत: गुरु ग्रह की विशेष पूजा से कल्याण होगा।
कुंभ का गुरु मिथुन, सिंह, तुला, मकर, राशि वालों के लिए शुभकारी होगा। विक्रम संवत 2066 एवं 2067 के पूर्वार्ध में विवाह मुहूर्त कम हैं। 16 दिसंबर 2009 से 8 फरवरी 2010 तक धनु मलमास, शुक्र अस्तदोष तथा 16 फरवरी से 13 अप्रैल तक गुरु अस्त, होलाष्टक एवं मीन मलमास दोष रहेगा।
15 मई से पुन: विवाह मुहूर्त आरंभ होंगे। वर्ष 2010 में भी विवाह मुहूर्त बहुत कम हैं अत: चार तिथियां अक्षय तृतीया, आषढ़ शुक्ल पक्ष नवमी, देव प्रबोधिनी एकादशी, चैत्र शुक्ल पक्ष नवमी (राम नवमी) आदि ऐसे मुहूर्त हैं, जिनमें तारा अर्थात शुक्र और गुरु के उदय व अस्त पर विचार करना जरूरी नहीं है। बड़े लड़के या लड़की का विवाह ज्येष्ठ मास में नहीं किया जाता।