इन 132 फिल्मों में ‘गजनी’, ‘रब ने बना दी जोड़ी’, ‘न्यूयॉर्क’, ‘वेक अप सिड’, ‘लव आज कल’ और ‘वांटेड’ सफल फिल्में हैं तथा इस उत्सव पर प्रदर्शित तीन फिल्मों में अजय देवगन की ‘ऑल द बेस्ट’ कमाई की फिल्म है। पूरे वर्ष में प्रदर्शित 132 में सिर्फ 6 कमाई की फिल्में हैं। असफलता का यह बड़ा प्रतिशत कोई नई बात नहीं है। गुजश्ता 96 वर्षो में कमोबेश यही खस्ता हाल हमेशा रहा है। इसी तरह चैनल पर प्रस्तुत कार्यक्रमों की सफलता का प्रतिशत भी लगभग इतना ही है और एक-दो चैनलों को छोड़कर सभी घाटे में चल रहे हैं। मनोरंजन जगत के उजले चेहरे से उसके पिचके हुए पेट का अनुमान नहीं लगता। केवल दर्जन भर लोग सफल और समृद्ध हैं और वे ही सुर्खियों में छाए रहते हैं। दीपक के नीचे के अंधेरे को हमेशा अनदेखा किया जाता है। अजीब बात यह है कि मनोरंजन उद्योग में असफलता का विवेचन हमेशा सतही ढंग से किया जाता है और प्राय: सच के हादसों से झूठ के नतीजे निकालकर संतुष्ट हो जाते हैं। उदाहरण के लिए राजीव कपूर की फिल्म ‘प्रेम ग्रंथ’ की असफलता का कारण चौथी रील में नायिका का बलात्कार समझा गया, जबकि इसी संस्था की सफल ‘प्रेम रोग’ में युवा विधवा का बलात्कार उसके जेठ द्वारा किया गया था। हाल ही में ‘वॉट्स योर राशि’ की असफलता का ठीकरा उसकी तीन घंटे चालीस मिनट की लंबी अवधि पर फोड़ा गया, जबकि इसी फिल्मकार की ‘लगान’ और ‘जोधा अकबर’ भी पौने चार घंटे की सफल फिल्में थीं। हाल ही में प्रदर्शित असफल फिल्म ‘ब्लू’ की अविश्वसनीय कथा और लचर पटकथा को दोष दिया जा रहा है, जबकि सफल ‘रेस’ इससे भी ज्यादा अविश्वसनीय फिल्म थी। ‘ब्लू’ में सितारों का मेहनताना 45 करोड़ रुपए है और निर्माण व्यय मिलाकर बजट 90 करोड़ होता है। अगर सितारों के मेहनताने समेत यह फिल्म 45 करोड़ की होती तो आंशिक घाटा होता। अधिकांश असफलताओं का कारण सितारों को दिया गैर-व्यावहारिक मेहनताना होता है। हर बड़े सितारे के साथ आने वाले उसके स्टाफ का भत्ता प्रतिदिन 15,000 रुपए से कम नहीं होता। सितारे का मनपसंद ड्रेस डिजाइनर 2000 की टीशर्ट निर्माता को 12,000 रुपए में टिकाता है। बजट का बीस फीसदी फिजूलखर्च होता है। यह सब सतही कारण हैं और इनका निवारण लाक्षणिक उपचार होगा। इस मुद्दे के दो पक्ष हैं। यह व्यवसाय अवाम को समझने से जुड़ा है। अधिकतम दर्शकों की पसंद से फिल्म सफल होती है। अवाम से भावनात्मक तादात्म्य बनाना आसान काम नहीं है। दुनिया के किसी और देश में अवाम की आकांक्षाओं को जानना आसान है- एक भाषा, सीमित धर्म और एक ही सांस्कृतिक विरासत। भारत में अनेक धर्म, भाषाएं हैं और यहां हर तीस किलोमीटर पर डायलेक्ट बदल जाता है। जो मराठी मुंबई और पुणो में बोली जाती है, वह सोलापुर और कोल्हापुर से अलग है। इस अनेकता में छुपी एकता को फिल्मी मुहावरे में ढालना कठिन काम है। फिल्म उद्योग में मौलिक चिंतन का अभाव है। फिल्मकारों की भारत की समझ ही अभी तक विकसित नहीं हुई है। भारत की प्रतिभा का न्यूनतम अंश फिल्म उद्योग से जुड़ा है। इस उद्योग में एक सफलता को फॉमरूले में बदलने की प्रवृत्ति है। ‘रब ने बना दी जोड़ी’ और ‘चक दे इंडिया’ को लिंग बदलकर ‘दिल बोले हड़िप्पा’ बनाई जाती है। उद्योग से जुड़े अधिकांश लोगों को अपने ही उद्योग का इतिहास पता नहीं है।
बहीखाते के पूजन के उत्सव के अवसर पर मनोरंजन का बहीखाता कहता है कि दिवाली 08 से इस दिवाली तक 240 फिल्में प्रदर्शित हुईं, जिनमें हिंदी भाषा में मात्र 132 फिल्में हैं, शेष मराठी, अंग्रेजी की हैं और 101 फिल्में डब की गई हैं। दक्षिण की चार भाषाओं का खाता अलग है।