आशुतोष गोवारीकर की जी जान
जयप्रकाश चौकसे Wednesday, October 28, 2009 00:27 [IST]  

Ashutosh Gowarikerपीवीआर के सहयोग से आशुतोष गोवारीकर अभिषेक बच्चन और असिन अभिनीत ‘खेलें हम जी जान से’ नामक फिल्म की शूटिंग नवंबर से गोवा में शुरू करने जा रहे हैं। इस फिल्म के बाद संभवत: वह महात्मा बुद्ध के जीवन पर आधारित भव्य कथा फिल्म में जुट जाएंगे। ज्ञातव्य है कि आशुतोष ने बाल कलाकार के रूप में भी काम किया है और वयस्क होने के बाद पहली भूमिका सलीम खान द्वारा लिखित और महेश भट्ट निर्देशित ‘नाम’ में उस टैक्सी ड्राइवर की निभाई थी जो दंगा ग्रस्त मुंबई में गर्भवती नायिका को अस्पताल ले जाता है।

निर्देशन के क्षेत्र में उनकी प्रारंभिक फिल्मों (बाजी) से यह अनुमान लगाना मुश्किल था कि वह ‘लगान’, ‘स्वदेश’ और ‘जोधा अकबर’ जैसी राष्ट्रीय महत्व की फिल्में बनाएंगे। फिल्म ‘वॉट्स योर राशि’ तो काजल की तरह है, जो उनकी अच्छी फिल्मों को नजर नहीं लगने के लिए बनाई गई प्रतीत होती है। गुरुदत्त की प्रारंभिक फिल्मों से भी ‘प्यासा’, ‘साहब बीवी और गुलाम’ तथा ‘कागज के फूल’ का अनुमान लगाना कठिन था। प्रतिभाशाली लोग आइसबर्ग की तरह होते हैं जिनकी सतह के ऊपर के कद से भीतर का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

यह गौरतलब है कि आशुतोष गोवारीकर का रुझान राष्ट्रप्रेम दर्शाती फिल्मों की ओर है। ज्ञातव्य है कि उनकी ताजा फिल्म 1930 में चिटगांव में हुई क्रांति से प्रेरित है। उनका दूसरा रुझान एपिक स्तर (महाकाव्यात्मक) की फिल्म बनाने का है। गोयाकि वह पहाड़ों में उफनती नदी की तरह नहीं, वरन मंथर गति से मैदानों मंे बहने वाली नदी की तरह फिल्में गढ़ते हैं।

वह चिटगांव क्रांति पर आधारित फिल्म एक थ्रिलर की तरह बना रहे हैं, ताकि आज की युवा पीढ़ी अपनी पसंद के अंदाज में अपने इतिहास से परिचित हो। ज्ञातव्य है कि दूसरे महायुद्ध के बाद फ्रांस में थ्रिलर फॉर्मेट में देशभक्ति की फिल्में बनाई गईं। फ्रांस की एक थ्रिलर फिल्म में नाजियों के कब्जे के दौर में पेरिस में युवा फ्रांसीसी नाजियों पर छोटे-छोटे हमले करते थे। ऐसे ही एक अंडरग्राउंड दल के पास भोजन नहीं है और एक ट्रक में हथियार तथा गोश्त भेजा जा रहा है। सामने से आते ट्रक की एक साइड में हल्के से तारपोलिन में छेद किया जाता है और मांस का टुकड़ा नीचे गिरता है। कुत्ते ट्रक के पीछे दौड़ रहे हैं और नाजियों को संदेह हो जाता है।

बहरहाल थ्रिलर दुनिया के सभी देशों में बनते रहे हैं, परंतु फ्रांस के फिल्मकारों ने उनमें सामाजिक सोद्देश्यता जोड़ दी और आशुतोष गोवारीकर स्वतंत्रता संग्राम के चिटगांव वाले हिस्से को इसी अंदाज में बनाने जा रहे हैं। इसी फिल्म के लिए वे रणबीर कपूर से मिले। उन्हें कहानी पसंद आई और वह आशुतोष के साथ काम भी करना चाहते हैं, परंतु नवंबर-दिसंबर में उनके पास डेट्स नहीं हैं।

साजिद नाडियाडवाला की फिल्म के लिए यह समय विगत वर्ष आरक्षित किया गया था, अत: अब आशुतोष इसे अभिषेक बच्चन के साथ बना रहे हैं। एक जमाने में मनोज कुमार काकोरी कांड पर फिल्म बनाना चाहते थे। कहानियों के अभाव की शिकायत करने वालों को स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास पढ़ना चाहिए। आज के युवा दर्शक को थ्रिल चाहिए, एक्शन चाहिए। यह सब संग्राम की कथाओं में उपलब्ध है। हिंदुस्तानी कहानियों के आधुनिक प्रस्तुतीकरण में ही भारतीय सिनेमाई मुहावरा पाया जा सकता है।

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