चंडीगढ़. जवाहर लाल नेहरू अर्बन रिन्यूवल मिशन, नेशनल हार्टिकल्चर मिशन और रूरल सेनिटेशन सहित कई केंद्रीय योजनाओं को लागू करने में पंजाब बुरी तरह से पिछड़ गया है।
कुछ योजनाओं में तो केंद्रीय योजनाओं को लेने के लिए राज्य सरकार से राशि रिलीज न होने के कारण दिक्कतें आ रही हैं तो कुछ में अफसरों की कारगुजारी इसके लिए जिम्मेदार है। केंद्रीय योजनाओं का निरीक्षण करने के लिए योजना आयोग की टीम नवंबर के अंत तक लुधियाना, अमृतसर और जालंधर के इलाकों के दो दिवसीय दौरे पर आ रही है।
इन योजनाओं की जमीनी हकीकत क्या है इसका टीम जहां जायजा लेगी। वहीं चंडीगढ़ में राज्य के आला अफसरों के साथ मीटिंग करके योजनाओं को लागू करने में आ रही दिक्कतों पर भी विचार करेगी। राज्य की सबसे महत्वपूर्ण योजना जवाहर लाल नेहरू अर्बन रिन्यूवल मिशन जिसमें अमृतसर (3150 करोड़) और लुधियाना (2054 करोड़) में खर्च होने थे पर ज्यादा राशि खर्च नहीं की जा सकी है।
स्थानीय निकाय विभाग इसके लिए वित्त विभाग द्वारा राशि न रिलीज किए जाने को जहां जिम्मेदार ठहरा रहा है वहीं विभाग ने हुडको से 500 करोड़ रुपए का लोन का प्रस्ताव भी तैयार किया हुआ है। लेकिन इस लोन के लिए ब्याज 13.5 फीसदी होने के चलते राज्य सरकार ने केंद्र से अपील की है कि इस मिशन हेतु लिए जा रहे लोन पर ब्याज दर पांच फीसदी रखी जाए।
इस मिशन पर काम की रफ्तार धीमे रखे जाने से राज्य सरकार को भय है कि कहीं मिशन की अवधि समाप्त न हो जाए। योजना आयोग की टीम के सामने राज्य सरकार यह प्रस्ताव रखने जा रही है कि अवधि बीतने के बावजूद राज्य को केंद्रीय सहायता जारी रखी जाए। काबिले गौर है कि मिशन के लिए प्रोजेक्ट का आधा हिस्सा कंेद्र सरकार ने देना है।
हाल बुरा है हार्टिकल्चर मिशन का भी
जवाहर लाल नेहरू अर्बन रिन्यूवल मिशन की तरह नेशनल हार्टिकल्चर मिशन का हाल भी बहुत बुरा है। 2005 मंे शुरू हुई इस योजना के लिए अब तक 356 करोड़ रुपए रखे गए हैं लेकिन विभाग मात्र 81 करोड़ रुपए ही खर्च कर पाया है। ऐसे में लगता है कि 2011 तक बागबानी के लिए रखा गया दो गुणा लक्ष्य पूरा हो पाएगा। ग्रामीण इलाकों में सौ फीसदी प्रसाधान उपलब्ध करवाने की योजना तो बुरी तरह से पिटी है। हालांकि इस योजना में मात्र 12 फीसदी राशि ही लाभपात्री ने देनी है, इसके बावजूद यह योजना जमीनी हकीकत नहीं ले पा रही है।
इस योजना को लागू करने में हरियाणा और हिमाचल जैसे राज्यों ने पंजाब को कहीं पीछे छोड़ दिया जाए। जानकारों का मानना है कि यदि यह योजना सही तरह से लागू हो जाए तो गांवों में रहने वाले अनुसूचित जातियों और स्वर्ण जातियों के झगड़े में काफी कमी आएगी, क्यों कि झगड़े के बाद स्वर्ण जातियों के लोग अनुसूचित जातियों को अपने खेतों का प्रयोग करने नहीं देते।