कथा जगत के चालीस कहानीकार
Bhaskar News Wednesday, October 28, 2009 23:14 [IST]  

जब मैंने पाकिस्तानी पंजाबी कहानियों का पहला संग्रह ‘सांझी पीड़’ तैयार किया, तो मेरे पास अकबर लाहौरी (जन्म 1910) से लेकर ख़ालिद फ़रहाद धारीवाल (जन्म 1958) तक की पौनी सदी में फैले पाकिस्तानी कथा जगत के चालीस कहानीकार थे।



इनकी कहानियों के साथ-साथ मुझे इनकी संक्षेप जानकारी भी चाहिए थी। मैं लाहौर में अपने दोस्त मकसूद साक़िब के प्रकाशन हाऊस ‘सुचेत किताब घर’ में बैठकर इन लेखकों को फोन करने लगा। साक़िब ने अपने पर्चे ‘पंचम’ में ख़ालिद की कुछ कहानियां छापी थीं।



‘पंचम’ पाकिस्तानी पंजाब की एक मियारी पत्रिका है और यह बढ़िया साहित्यक चुनाव के लिए पूर्वी पंजाब में भी मशहूर है। साक़िब ने ही सिफ़ारिश की थी कि ख़ालिद होनहार रचनाकार है और संग्रह में उसकी कहानी शामिल की जा सकती है।



जब मैंने उसकी कहानी ‘घर’ पढ़ी, तो मुझे ख़ुशी हुई कि साक़िब का दावा सही था। कहानी से लेखक की सूक्षम सोच और कहानी लिखने की कला की झलक मिल रही थी। मैंने फोन पर ख़ालिद से उसके बारे में संक्षेप में पूछने के अलावा और भी कई बातें कीं।



उसने पूरे पंजाब के उन कहानीकारों के नाम लिए, जो पाकिस्तान की अलग-अलग पत्रिकाओं में छप चुके थे। उन्होंने कहा कि मैं आपके अलावा जिंदर, सुखजीत, भगवंत रसूलपुरी, अजमेर सिद्धू आदि कलाकारों को मिलने की इच्छा रखता हूं। प्रेम प्रकाश के तो वह दीवाने थे।



मुझे भी उनसे उत्सुकता जाग गई। मैंने कहा कि इस बार तो शायद मुमकिन न हो सके, क्योंकि सियालकोट ज़िले में पड़ने वाला उनका गांव टावरियां वाला लाहौर से कम से कम 120 किलोमीटर दूर था और उस दिन लाहौर में मेरा आख़िरी दिन था।



मैंने ख़ालिद से अगली बार मिलने का वादा कर लिया। उन्होंने कहा कि जब भी अगली बार आना, तो मेरे लिए बलदेव धालीवाल और रजनीश बहादुर सिंह की कहानियों और आलोचना की किताबें लेते आना।



अगली बार जब मैंने ख़ालिद को ई-मेल पर सूचना दी कि मैं बैसाखी पर आ रहा हूं, तो उन्होंने लिखा कि मैं उनके लिए प्रेम प्रकाश और रघुबीर ढंड की किताबों का सैट भी लेता आऊं। मैंने महसूस किया कि वह गंभीर पाठक हैं।



इसलिए मैंने उनकी बताई किताबों के अलावा कुछ और अपनी पसंद की किताबें भी ले लीं। पाकिस्तान जाकर लाहौर से गुरुद्वारा जाने का प्रोग्राम बनाया, तो मैंने ख़ालिद को फोन किया कि वह रास्ते में ही मिले। ख़ालिद ने कहा कि वह सुबह दस बजे काले-के मोड़ पर आ जाएंगे।



मैंने उन्हें कार का नंबर बता दिया। सवा दस बजे जब हम निश्चित जगह पहुंचे, तो एक पतला-दुबला नौजवान उत्साह के साथ हमारी तरफ़ बढ़ा। सिर के बाल कटे, पर दाढ़ी रखी। मैं अपने साथियों पाल सिंह वल्ला और कल्याण सिंह कल्याण के साथ बाहर निकला, तो वह गर्मजोशी के साथ मिला।



हालचाल पूछा और उन्हें साथ बिठाकर आगे चल पड़े। ख़ालिद कुछ पलों में ही ऐसे घुलमिल गया, जैसे कई सालों से जानता हो। वह इलाक़े के बारे में, लोगों के बारे में, खेतीबाड़ी और साहित्य के बारे में बातें करता रहा। हम सारा दिन इकट्ठे रहे।



गुरुद्वारा करतारपुर साहिब समेत कई जगहों पर गए। कोई वाक़िफ़ मिलता, तो ख़ालिद मेरी तरफ़ इशारा करके पूरी ख़ुशी से बताते कि यह मेरे बड़े भाई हैं। मैं उनके चेहरे से छलकने वाली ख़ुशी के अहसास को देखता रहा। उसने कई जगह हमें चाय पिलाई, दोपहर का खाना खिलाया।



विदा होते व़क्त मैंने किताबों का बंडल उसे दिया, तो उसने हज़ार के दो नोट निकालकर पैसे देने चाहे। मैंने कहा, ‘सबको बताते फिरते हो कि मेरा बड़ा भाई है, तो फिर पैसे किस बात के?’ ‘किताबों के भाई साहिब। ये मु़फ्त तो नहीं आती न।’ वह बोला।



‘नहीं ख़ालिद, भाइयों में हिसाब नहीं होना चाहिए। तुम पैसे जेब में डाल लो।’ मैंने प्यार से उसका पैसों वाला हाथ उसकी जेब में डाल दिया। ख़ालिद ने भरी आंखों से मुझे गले लगाया और कहा, ‘एक और काम कर देना। अगली बार मेरे लिए एक पगड़ी लेकर आना।



नई नहीं, जो आपने पहले अपने सिर पर बांधी हो, वही मेरे सिर पर बांध देना।’ मैं उनकी भावनाओं को समझ गया था। मेरे मन में भी इसी तरह का अहसास पैदा हो रहा था। शायद दिल को दिल की राह थी।



‘ठीक है।’ मैंने कहा। ख़ालिद बार-बार मेरी तरफ़ देखता हुआ पीछे मुड़ गया। हम लाहौर वापस आ गए। अगली बार मैंने ज़ुबैर अहमद के प्रकाशन हाऊस ‘किताब त्रिंजण’ में ख़ालिद के सिर पर अपनी पगड़ी बांधी, तो वह ख़ुशी से नाचने लगा। अलग-अलग पोज़ों में कई फोटो खिचवाईं। उसकी ख़ुशी देखकर मेरी आंखें छलक उठीं।-तलविंदर सिंह

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