इंडियन समर और वैचारिक अकाल
जयप्रकाश चौकसे Thursday, October 29, 2009 00:15 [IST]  

Indian Summerहॉलीवुड की फिल्म ‘इंडियन समर’ पंडित जवाहर लाल नेहरू और श्रीमती एडविना माउंटबेटन की प्रेम कथा पर आधारित एक काल्पनिक फिल्म है। भारत में इसकी शूटिंग पर रोक लगाए जाने के कारण फिल्म खारिज कर दी गई है।

प्रेम कहानी होने से नायक-नायिका के अंतरंग प्रेम दृश्यों के कारण ही प्रतिबंध लगाया गया है। इस मुद्दे के मूल में यह बात है कि हम अपने नेताओं, कवियों और अन्य कलाकारों को मनुष्य नहीं मानते हुए पूजनीय बना देते हैं और राजनीतिक गतिविधियों में श्रद्धा को स्थापित करने की चेष्टा करते हैं।

यह सब अवतारवाद की धारणा के बायप्रोडक्ट हैं। हम हर मनुष्य में देवता या दानव देखना चाहते हैं, जबकि मनुष्य के मात्र मनुष्य बने रहने में ही उसकी गरिमा है। आम आदमी तथा आम सहज जीवन का यह घोर अपमान है। हमारे आख्यानों और किंवदंतियों ने जीवन के यथार्थ को हाशिए में धकेल दिया है। आम आदमी सतह के ऊपर उठकर विपरीत परिस्थितियों में अति बलशाली को पराजित करे- यही सबसे बड़ा आदर्श है, परंतु हमने दैवीय शक्तियों वाले काल्पनिक पात्रों को सच मान लिया है।

पूरा भारत एक विशाल चौपाल है, जहां निरंतर किस्सागोई चल रही है। हम संसद-संसद खेल रहे हैं और स्वयं को विशालतम लोकतंत्र घोषित करके इतरा रहे हैं, जबकि देश के एक बड़े प्रतिशत ने पूरे जीवन में एक बार भी संपूर्ण आहारयुक्त भोजन नहीं किया है। राष्ट्रीय शर्म के सारे तथ्यों को श्रेष्ठि वर्ग के मखमली कालीनों के नीचे धकेल दिया है और डिटर्जेट के ढेरों विज्ञापनों से लगता है कि बड़ा साफ -सुथरा देश है। हम विज्ञापन के लिए रचित फंतासी को सच मान रहे हैं और सारी सड़ांध को अनदेखा करके काल्पनिक घोषित कर रहे हैं।

हमारी इसी संकीर्ण विचारधारा ने मोहल्लाई हुल्लड़बाजों को जन्म दिया है, जो आम आदमी के सरल जीवन में बाधाएं उत्पन्न करते हैं। सरकारी सेंसर के ऊपर बहुत से लोकल सेंसर पैदा हो गए हैं। आपातकाल के दौरान जे. ओमप्रकाश, गुलजार और कमलेश्वर की सुचित्रा सेन अभिनीत ‘आंधी’ फिल्म को प्रदर्शन के बाद रोक दिया गया था। आरोप था कि इंदिरा गांधी की छवि बिगाड़ी गई है। विट्ठल भाई पटेल के प्रयासों से मैडम ने फिल्म देखी और उन्हें कुछ भी काबिले-ऐतराज नहीं लगा। फिल्म पुन: प्रदर्शित की गई। जाहिर है कि नेता से अधिक तकलीफ छुटभैयों को होती है।

आजकल प्रदर्शन रोकने से कोई लाभ नहीं होता, क्योंकि लोग अवैध डीवीडी पर फिल्म देख लेते हैं और प्रतिबंधित फिल्मों की डीवीडी ऊंचे दामों में बिकती हैं। कुछ दिन पहले डैन ब्राउन के घटिया उपन्यास पर आधारित क्रिश्चियन विरोधी फिल्म का प्रदर्शन भारत के कुछ शहरों में रोका गया, परंतु पश्चिम के किसी भी क्रिश्चियन बहुल देश ने प्रदर्शन पर रोक नहीं लगाई। व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सोच पर रोक नहीं लगानी चाहिए। हमने जसवंत सिंह की अत्यंत साधारण किताब पर हंगामा बरपा कर उसे तीव्रतम बिकने वाली किताब बना दिया।

आजादी मिले साठ वर्ष हो गए हैं, परंतु सत्ता ने देश को वयस्क और विचारक नहीं बनने दिया। हमें क्या पढ़ना चाहिए, क्या देखना चाहिए, इसका निर्णय हमारे बदले कोई और लोग लेते हैं। विचार क्षेत्र में हमारे यहां हमेशा सूखा मौसम बना रहता है, इसलिए ‘इंडियन समर’ रोक दी जाती है।

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