सिर्फ़ एक छोटा-सा सत्य
Bhaskar News Thursday, October 29, 2009 00:25 [IST]  

सिर्फ़ मानव कर्म है जिसके द्वारा ‘छायाओं का संसार’ हाड़, मांस और जीवन्त आकार से संपन्न होता है, सांस लेता है, जीने का सत्व ग्रहण करता है। कर्म का यह रहस्य है, जिसमें शब्द जीता है, जिसे आज तक कोई भी अधिनायक, सत्तवा, तानाशाही, इतिहास की बर्बर अमानवीय थपेड़ नष्ट नहीं कर पाई?



यह रहस्य और कोई नहीं सिर्फ़ एक छोटा-सा सत्य है- इस धरती पर मनुष्य का होना, उसकी उपस्थिति का अमोघ और चमकीला बोध। जब मनुष्य और मनुष्य के बीच संवाद की संभावनाएं झूठ, हिंसा और आतंक के अंधेरे में डूबती-सी जान पड़ती हैं, तब भी मनुष्य का होना एक अकेले दीए-सा टिमटिमाता रहता है। वह सिर्फ दिया न होकर मानव कर्म है, जो अनेक रूपों में अपने को प्रमाणित करता हुआ जीवित रहता है। भाव मैं हूं।



अंधेरे को छूना



यदि गौतम बुद्ध बारह वर्ष समाधि में रहकर कोई सत्य, सत्य का दर्शन उपलब्ध कर पाए तो अवश्य ही वह दर्शन अपने में संपूर्ण रहा होगा। यदि ऐसा था तो उन्हें सारनाथ में चार आदमियों के सम्मुख अपना संदेश देने की क्यों ज़रूरत महसूस हुई? क्या कहीं उनकी आत्मोपलब्धि संपूर्ण होने पर भी आत्मशकित, अप्रमाणित थी? क्या ऐसा नहीं था कि बुद्ध का दर्शन केवल अपने संदेश में ही सम्पूर्ति पा सकता था?



मनुष्य की स्वतंत्रता



मुझे इनमें रंचमात्र भी संदेह नहीं कि साक्षात्कार की यह सम्भावना केवल लोकतंत्र में ही फलीभूत हो सकती है, अधिनायकवादी व्यवस्था में नहीं, उसका रूप चाहे कुछ भी हो। अक्सर हम समझते हैं कि लोकतंत्र में मनुष्य के सिर्फ़ अधिकार होते हैं, जबकि अधिनायकवादी व्यवस्था में उसे सिर्फ़ अपने दायित्व ढोने पड़ते हैं।



सत्य इसके बिलकुल विपरीत है। अधिनायकवादी व्यवस्था में दायित्व नहीं, डर रहता है, जबकि दायित्व की असली भावना केवल मनुष्य की स्वतंत्रा से उत्प्रेरित होती है। स्वतंत्रता की यह अद्भुत विशेषता है कि वह अपने में कोई मूल्य नहीं, वह मनुष्य की जैविक ज़रूरत है, जो मानवीय मूल्यों को जन्म देती है। न्याय, लोकतंत्र, सौन्दर्य की भावना, प्रेम- ये सब मूल्य हैं, जो केवल मनुष्य में सन्निहित स्वतंत्रता के कारण जीवित होते हैं और उसके न रहने पर मुरझा जाते हैं।- निर्मल वर्मा

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