Raipur
नक्सली अभियान पर राजनीति
भास्कर न्यूज Thursday, October 29, 2009 02:14 [IST]  

रायपुर. अगले महीने प्रस्तावित नक्सल विरोधी अभियान के पहले प्रदेश में राजनीतिक जंग शुरू हो गई है। भाजपा तो पूरी तरह से अभियान के साथ दिख रही है पर कांँग्रेस के अंदर ही दो गुट हो गए हैं। पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी अभियान के वर्तमान स्वरूप से नाराज बताए जाते हैं और इस बारे में उन्होंने प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम को पत्र भेजा है।



जोगी विरोधी कांग्रेसियों की राय एकदम अलग है। नक्सलियों के खिलाफ अभियान में सालों से सक्रिय कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा का कहना है कि यह तो आरपार की लड़ाई है। अगर इसमें सफलता नहीं मिली तो इसके बाद शायद ही कोई सरकार नक्सलियों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई की हिम्मत कर पाए।



ऑपरेशन ग्रीन हंट के नाम से कई राज्यों में एक साथ चलने वाले अभियान पर बस्तर में काम कर रहे एनजीओ सक्रिय हो गए हैं। मानवाधिकार के क्षेत्र में काम करने वाले कई संगठनों ने दिल्ली के स्तर पर माहौल बनाना शुरू कर दिया है। बस्तर में काम कर रहे कुछ एनजीओ नक्सली अभियान में आदिवासियों की मौत के मामले को लेकर दिल्ली गए हैं।



सालों से नक्सली ऑपरेशन से जुड़े पुलिस अधिकारियों का कहना है कि नक्सली आमतौर पर हमला करते समय बच्चों और महिलाओं को आगे रखते हैं। संघम सदस्य और जनमिलिशिया में भी लोग हैं। असली नक्सली तो इनके पीछे छिपकर फोर्स पर हमला करते हैं। पुलिस मुख्यालय और प्रदेश की सरकार पिछले दो महीने से इसी अभियान की तैयारियों में व्यस्त है। दूसरे राज्यों से अर्ध सैनिक बलों की कंपनियों के आने का क्रम चल रहा है।



राजनीतिक दलों के बीच भी खलबली है। खासकर कांग्रेस में, जो साफ-साफ दो गुटों में बंटी दिख रही है। अजीत जोगी की नक्सलियों के बारे में शुरू से राय एकदम अलग रही है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि जोगी ने प्रधानमंत्री समेत पार्टी के सभी बड़े नेताओं को हाल में भेजे एक पत्र में आशंका व्यक्त की है कि ऑपरेशन में सावधानी नहीं बरती गई तो कई निदरेष आदिवासी मारे जाएंगे।



लोगों का सरकार और प्रशासन से विश्वास उठ सकता है। सुरक्षा बलों को पूरी सावधानी के साथ अभियान चलाना होगा। जोगी का कहना है कि सशस्त्र मुकाबले के अलावा सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्तर पर भी कोशिश होनी चाहिए। अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद की छत्तीसगढ़ इकाई की हाल में रायपुर में हुई बैठक में भी निदरेष आदिवासियों के मारे जाने की आशंका को उठाया गया था। परिषद के ज्यादातर पदाधिकारी जोगी गुट के हैं।



महेंद्र कर्मा की राय एकदम अलग है। वे मानते हैं कि नक्सलियों और पुलिस के बीच मुकाबले में निदरेषों के मारे जाने की आशंका को एकदम खारिज नहीं किया जा सकता। वह स्वयं इस प्रयास में लगे हैं कि ऐसे हादसे न हों। राज्य सरकार को चाहिए कि वह इसे नक्सलियों से इलाके की मुक्ति के अभियान के रूप में प्रचारित करे। ऐसा संदेश गया तो नक्सलियों से त्रस्त हो चुके लोग अपने आप शासन के साथ हो लेंगे।



नाराज कर्मा ने कहा कि आम आदिवासी को संदेह के दायरे में लाने का असली गुनाह तो नक्सलियों ने किया है। बलीराम कश्यप के बेटे की हत्या से लेकर कई हमले ग्रामीणों की वेशभूषा में आए नक्सलियों ने किए। किसी के चेहरे पर तो लिखा नहीं होता कि वह नक्सली है या नहीं। कर्मा ने कहा कि यह अभियान विफल न हो, इसकी वह पूरी कोशिश करेंगे। नेता प्रतिपक्ष रविंद्र चौबे ने कहा कि नक्सलियों की वजह से बस्तर में अराजकता की स्थिति है। केंद्र शासन ने पहल करके अभियान की रूपरेखा तैयार की है।



चौबे ने माना कि अभियान के दौरान आम निदरेष लोगों की सलामती जरूर एक बड़ा मुद्दा है। इस बारे में राज्य सरकार को पूरा ध्यान देना होगा। जब फोर्स और प्रशासन वहां पहुंचेगा, तो लोग अपने आप नक्सलियों का साथ छोड़ देंगे। चूंकि बस्तर में पुलिस और प्रशासन का नामोनिशान नहीं था, इसलिए दहशत में लोग माओवादियों का साथ दे रहे थे। अभियान को किसी भी सूरत में रोका नहीं जाए। सीपीआई के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य चितरंजन बक्शी भी मान रहे हैं कि नक्सली आम आदिवासियों और ग्रामीणों को आगे कर देते हैं।



पश्चिम बंगाल की सीमा पर राजधानी एक्सप्रेस को रोकने की कोशिश भी ऐसा ही मामला था। फोर्स और नक्सलियों के बीच होने वाले संघर्ष में मरेगा तो आम आदिवासी ही। संभव है कि फोर्स उन्हें ही बाद में नक्सली बता दे। इस तरह के उदाहरण पहले भी मिले हैं। बक्शी का कहना है कि नक्सली समस्या राजनीतिक प्रयासों से ही हल की जा सकती है।




अभियान में इस बात का पूरा ध्यान रखा जा रहा है कि आम आदमी को इसमें नुकसान न हो। अभियान इंटेलिजेंस बेस्ड होगा, जिसमें नक्सलियों की पोजीशन के बारे में पुख्ता जानकारी के आधआर पर ही कार्रवाई होगी।
विश्वरंजन, डीजीपी



बस्तर में नक्सलियों के खिलाफ इस तरह के अभियान की बात वह पिछले चार सालों से कर रहे है। देर से ही सही पर स्थिति की गंभीरता को समझा तो गया। नक्सलियों की मानव ढाल की बात है तो एक बार फोर्स के जंगल में घुसने के बाद सारी स्थिति ठीक हो जाएगी। राज्य की एसटीएफ को इसी तरह के आपरेशन के लिए ट्रेंड किया गया है।
बीके पोनवार, डायरेक्टर, जंगल वॉरफेयर कॉलेज, कांकेर

  Bookmark and Share
 


अपने विचार यहां लिखें:
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: