इंदौर. इंदौर के छत्रीबाग स्थित प्राचीन वेंकटेश मंदिर में करीब 100 साल पुराना ‘तुलसी उद्यान’ है। यह करीब पांच हजार स्क्वेयर फीट में फैला है। इसके आधे हिस्से में फिलहाल तुलसी के पौधे लगे हैं। उद्यान की एक किलो से ज्यादा तुलसी से रोज ‘ठाकुरजी’ (प्रभु वेंकटेश) की अर्चना की जाती है।
मंदिर में अधिकांश ‘राम’ तुलसी है जबकि कुछे पौधे ‘श्यामा’ तुलसी के भी हैं। मंदिर के प्रमुख स्वामी नागौरिया पीठाधीश्वर विष्णुप्रपन्नाचार्य महाराज के मुताबिक ‘ठाकुरजी’ की अर्चना बिना तुलसी के अधूरी मानी जाती है। इसलिए उद्यान के ज्यादातर हिस्से में तुलसी के पौधे लगाए गए हैं। देवउठनी ग्यारस को मंदिर में तुलसी के पौधों की पूजा की जाएगी।
ओम की आकृति में बना उद्यान
एरोड्रम रोड स्थित पद्मावती वेंकटेश देवस्थान में ओम की आकृति में तुलसी उद्यान बनाया गया है। नृसिंह बाजार स्थित प्राचीन नृसिंह मंदिर में भी तुलसी के पौधे लगे हुए हैं। एरोड्रम रोड स्थित श्रीश्री विद्याधाम में भी तुलसी के पौधे लगाए गए हैं। पंडितों के अनुसार तुलसी की तीन किस्म होती हैं। राम तुलसी हरे रंग की होती है। इसके पत्ते छोटे होते हैं। श्यामा तुलसी के पत्ते श्याम रंग के साथ ही अपेक्षाकृत बड़े होते हैं। तीसरी किस्म वन तुलसी है जिसे मरुआ कहते है।
धार्मिक महत्व
भगवान को तौला था तुलसी के पत्ते से : डॉ. नारायणदत्त शास्त्री के मुताबिक भगवान श्रीकृष्ण को जब स्वर्ण से तौला गया तब भगवान नहीं तुले। जब द्रौपदी ने तुलसी का पत्ता तुला पर रखा तब तुला उस ओर झुक गई।
वैज्ञानिक आधार
200 फीट तक के रोगाणु नष्ट करती है : डॉ. विनायक पांडे के मुताबिक तुलसी 200 फीट के सूक्ष्म रोगाणुओं को नष्ट करती है। तुलसी वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा देती है। जहां तुलसी का पौधा होता है वहां नवग्रह पीड़ा का सीधा असर नहीं होता। प्रतिदिन तुलसी का पूजन-अर्चन किया जाए तो समृद्धि प्राप्त होती है।
साल में तीन बार रोपे जाते हैं पौधे
वेंकटेश उद्यान में ज्यादातर जगह पर तुलसी के पौधे होने से इसे ‘तुलसी उद्यान’ के नाम से जाना जाता है। मंदिर के ट्रस्टी प्रहलाददास जाखेटिया के मुताबिक मंदिर 100 साल से भी ज्यादा पुराना है, तभी से यह उद्यान भी है। मंदिर के अर्चक कृष्णा भैया के अनुसार साल में करीब तीन बार पौधे रोपे जाते हैं। विशेष मौकों पर औषधि के लिए भी इसका प्रयोग किया जाता है।
मंगल ध्वनि के बीच आज उठेंगे देव
चार माह के शयन पश्चात देव गुरुवार को जागेंगे। छोटी दीपावली (देव दीवाली) का जश्न हर घर में होगा। शाम को आंगन में रंगोली बनेगी, दीपक जलेंगे और रोशनी झिलमिलाएगी। आतिशबाजी से आसमां रंग-बिरंगा तो होगा ही, तुलसी विवाह भी होगा।
देवउठनी ग्यारस पर गुरुवार सुबह से मंदिरों व घरों में प्रबोधनी एकादशी पर धूप, दीप, नैवेद्य, गंध-चंदन, फल आदि से भगवान की पूजा की जाएगी। शंख, मृदंग व अन्य वाद्य यंत्रों की मंगल ध्वनि से भगवान को ‘उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविंद.. त्रैलोक्यं मंगलं कुरु’ से या फिर ‘आंवला-सांवला, बोर-भाजी, उठो देव घंटाल बाजी’ कहकर भगवान से जागने की प्रार्थना की जाएगी। तरह-तरह की सब्जी व फलों का भोग लगाया जाएगा। शाम को घरों के बाहर रंगोली बनाकर दीप जलाएंगे, विद्युत सज्जा होगी और आतिशबाजी की जाएगी।
कहीं आज कहीं कल तुलसी विवाह
देवउठनी ग्यारस पर विवाह का नक्षत्र नहीं होने से कई लोग परंपरा अनुसार तुलसी विवाह करेंगे। कई स्थानों पर यह आयोजन 30 अक्टूबर को भी होगा। क्लॉथ मार्केट कॉमर्स कॉलेज में देवउठनी ग्यारस पर तुलसी विवाह होगा। साथ ही 501 तुलसी के पौधे भी बांटेंगे।
डॉ. छाया मिश्र ने बताया छात्राओं को तुलसी का आयुर्वेदिक महत्व बताया जाएगा। पालीवाल समाज द्वारा 30 अक्टूबर को शाम 6 बजे समाज की धर्मशाला में तुलसी विवाह होगा, शोभायात्रा निकलेगी। आयोजक बालकृष्ण ललित ने बताया श्रेष्ठ मुहूर्त 30 को है।