ढूंढ़े नहीं मिल रहे एमबीए स्टूडेंट
गजेन्द्र विश्वकर्� Friday, October 30, 2009 04:38 [IST]  

indoreइंदौर. प्रदेश के एमबीए, एमसीए और फार्मेसी कॉलेजों के फाइनल अलॉटमेंट गुरुवार को घोषित कर दिए गए। इंजीनियरिंग कॉलेजों की तरह ही इन कॉलेजों की हालत भी बदतर हो गई है। चार राउंड में काउंसिंलिंग कराने के बाद भी कॉलेजों को छात्र नहीं मिले, जबकि इस वर्ष एमबीए में पहली बार बिना एंट्रेंस के सीट लेने का मौका दिया गया था।

प्रदेश की एमबीए, फार्मेसी और एमसीए की कुल 28120 में से 11057 सीटें खाली रह गई हैं। कॉलेज अब स्थानीय स्तर पर काउंसिलिंग कराने की मांग कर रहे हैं लेकिन जानकारों का मानना है सीटों के मुकाबले छात्र ही नहीं हैं तो फिर सीटें कैसे भरेंगी।

धड़ल्ले से मिल रही है मान्यता

सरकार ने जिस तरह बिना सोचे धड़ल्ले से प्रदेश में इंजीनियरिंग कॉलेजों को मान्यता दी है उसका नतीजा इस पीईटी काउंसिलिंग में देखने को मिल गया। पिछले साल भी ऐसी ही नौबत आई थी कि शून्य नम्बर वालों को इंजीनियर बनाने का मौका दिया गया। ऐसा ही इस साल एमबीए कॉलेजों के साथ हुआ। प्रदेश में 2009 में 30 नए मैनेजमेंट कॉलेजों ने दस्तक दी है। इसमें अकेले इंदौर में 18 नए कॉलेज शुरू हुए है।

सेकंड काउंसिलिंग में खुली नींद

ऐसी स्थिति का अंदाजा एमबीए कॉलेजों को शुरुआत में नहीं था लेकिन सेकंड काउंसिलिंग के बाद जब आधी सीटे खाली रह गई तो उनकी धड़कने तेज हुई। इसके बाद बीई सहित सभी कॉलेजों ने हाईकोर्ट में अपील लगाई कि उन्हे स्थानीय स्थर पर काउंसिलिंग कराने की अनुमति दें। यदि ऐसा नहीं हुआ तो वे भारी नुकसान में चले जाएंगे। फिलहाल हाईकोर्ट ने गवर्नमेंट से सीटे की पूर्ति का रास्ता ढूंढने के लिए कहा है। 30 अक्टूबर को इस पर निर्णय होना है।

५क्क् करोड़ का घाटा : प्रदेश की बाकी सीटों के अनुमान से अंदाजा लगाया जा रहा है कि इस बार बीई, एमबीए, फार्मेसी और एमसीए कॉलेजों को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। एसकेएसआईटीएस के डायरेक्टर शरद सिसोदिया बताते है कैल्कुलेशन किया जाए तो प्रदेश के कॉलेजों को इस बार ५क्क् करोड़ का घाटा उठाना पड़ेगा।

४क् हजार में देने पड़े एडमिशन : गवर्नमेंट ने बीई के लिए वार्षिक फीस 54 हजार निर्धारित कर रखी है। इस बार स्थिति ऐसी है कि कुछ कॉलेजों ने 40 हजार वार्षिक फीस में ही एडमिशन दे दिया। कुछ कॉलेजों ने तो पहले के दो साल फीस न लेने की शर्ते पर एडमिशन दिए है।

गवर्नमेंट के पास प्लानिंग की कमी : ग्लोबलाइजेशन से फायनेंस सेक्टर में बूम है जिससे कुछ स्टूडेंट्स इंजीनियरिंग छोड़ एमबीए की और जा रहे है। सिनेरियों भी बदला है पहले इंजीनियरिंग करना सपना हुआ करता था लेकिन अब इतना क्रेज नहीं रहा। कॉलेजों में सीटो का बैलेंस गवर्नमेंट की प्लानिंग के कारण बिगड़ा है उन्हे इसके लिए नए नियम बनाने होंगे। - डॉ. पी.के. चांदे, पूर्व सीनियर प्रो. आईआईएम व पूर्व डायरेक्टर एसजीएआईटीएस

स्टूडेंट्स ही नहीं है..

पहली बार चार राउंड में काउंसिलिंग हुई है इसके बावजूद कॉलेज तारीख बढ़ाने और लोकल स्थर पर काउंसिलिंग कराने की मांग कर रहे है। जब स्टूडेंट्स ही नहीं है तो आगे की प्रक्रिया का क्या मतलब हॉलाकि अंतिम निर्णय कोर्ट को लेना है। - आशीष डोंगरे, डायरेक्टर, टेक्निकल एजुकेशन भोपाल

एआईसीटीई और आरजीपीवी जिम्मेदार

एआईसीटीई बिना सोचे-समझे धड़ल्ले से कॉलेजों को मान्यता दिए जा रहा है। सीटें भरने के लिए कॉलेज कई दांवपेच लगा रहे हैं लेकिन इसके बावजूद जब सीटें नहीं भरा पा रही हैं तो सरकार पर दबाव बनाते दिख रहे हैं। कॉलेजों को पता होते हुए भी एक कैम्पस में तीन-तीन इंस्टिटच्यूट खोले हुए हैं। प्रदेश में जितने कॉलेज खुल गए हैं उतने स्टूडेंट्स असल में हैं ही नहीं। एआईसीटीई और आरजीपीवी को स्टूडेंट्स की संख्या को ध्यान में रखते हुए ही कॉलेजों को मान्यता देना चाहिए।



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