पिछले दिनों कुछ भड़के हुए लोगों ने क़स्बा टांडा उड़मुड़ के जाजा चौक में पंजाब रोडवेज की एक बस को जला दिया। बस जलाने के लगभग एक सप्ताह बाद जली हुई बस को देख एक बुज़ुर्ग रो रहा था।
यह मंजर देखकर मैं हैरान रह गया। क्या बात हो सकती है कि एक सप्ताह बाद जली हुई बस को देखकर यह बुजुर्ग रो रहे हैं। जब रहा नहीं गया, तो मैं उस बुज़ुर्ग को धीरे-धीरे पास के होटल में ले गया और चाय पीते-पीते बातों के दौर से ऐसी कहानी सामने आई कि मैं भीतर तक कांप गया।
गढ़शंकर के पास के एक गांव में रहने वाले बुज़ुर्ग की उम्र सत्तर के आस-पास लग रही थी। जली हुई बस ने उसे 1947 के देश बंटवारे में जले अपने घर की याद दिला दी थी। उस बुज़ुर्ग की कथा ने मुझे यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि पता नहीं और कितने लोग देश के बंटवारे से पीड़ित होकर ख़ुद को मार कर जी रहे हैं।
बुज़ुर्ग ने बताया कि वह आजदी मिलने से पहले मुसलमान परिवार में पैदा हुए और जब पाकिस्तान बनने की ख़बरें गढ़शंकर के नÊादीक पड़ते हमारे गांव पहुंचनी शुरू हुईं, तो गांव में रहते मुसलमानों के सभी पंद्रह-सोलह घरों ने अपना सामान बांधना शुरू कर दिया।
उस समय की सारी बातें मुझे याद है, लेकिन तब स्थिति की गंभीरता का अहसास नहीं था। गांव के हिंदू-सिखों के साथ मेरे पिता के संबंध काफ़ी अच्छे थे। वह तांगा चलाते थे। जब आस-पास से मारने-काटने की ख़बरें आने लगीं, तो मेरी मां मेरी बहनों और चाचा-चाची के साथ जालंधर के पास बने कैंप में चले गए।
घर में मैं और मेरे पिता शायद हालात ठीक होने की उम्मीद से या फिर सामान समेटने के लिए रुक गए। उसी रात हमारे घरों को ख़ाली जानकर एक जत्थे ने हमला कर दिया। मुसलमानों के ख़ाली हुए घरों के बचे-खुचे सामान को लूट लिया गया।
तभी तीन हमलावर नंगी तलवारें लिए हमारे घर की ओर आए, तो मेरे पिता ने रहम की बात की। लेकिन अंधे हुए हमलावरों ने तलवार के एक वार से उनके जिस्म को धरती पर तड़पने के लिए छोड़ दिया।
इसी बीच हमारे एक पड़ोसी ने हमलावरों के कहर से मुझे बचा लिया और अपने घर ले आए। क़रीब एक-डेढ़ घंटे बाद मैंने अपने घर से आग की ऊंची लपटे निकलती देखीं। फिर मुझे सिख बनाकर बेटों की तरह उन लोगों ने अपने घर में रखा।
आज मेरा परिवार है, बच्चे हैं, लेकिन जब भी कही मैं आग से इस तरह जली चीज़े देखता हूं, तो जलता हुआ वो घर याद आ जाता है। तड़पते हुए पिता याद आ जाते हैं। कहीं गुम हो गई मां और बहने याद आती हैं।
पता नहीं उनमें से कोई जीवित है या नहीं, परंतु उनसे मिलने की, उन्हें एक बार देखने की इच्छा मन में दबी पड़ी सिसक रही है। अब मेरे गांव में, मेरे परिवार में मेरे अतीत के बारे में कोई कुछ नहीं जानता।
लेकिन जब भी मैं अपने पुराने घर के पास से गुजरता हूं, तो पिता के तांगे की तस्वीर व उनके मरते व़क्त की तड़पन मेरे चैन को कहीं दूर भगा देती है। फिर मैं अपने अस्तित्व को ढूंढ़ने लगता हूं? ख़ुद से ही पूछने लगता हूं कि मैं कौन हूं, क्या हूं?- परमवीर सिंह बाठ