महान साहसी देशभक्त
रामचंद्र गुहा Saturday, October 31, 2009 00:18 [IST]  

Ramachandra Guhaवर्ष 1965 की गर्मियों में इंदिरा गांधी नई दिल्ली छोड़कर लंदन में बसने के बारे में सोच रही थीं। तब वह अपने पिता जवाहर लाल नेहरू के उत्तराधिकारी प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के मंत्रिमंडल में जूनियर मंत्री हुआ करती थीं। उनकी राजनीतिक संभावनाएं बहुत उज्‍जवल नहीं थीं, लेकिन इंग्लैंड के प्रति उनका खिंचाव निजी कारणों से था। उनके दोनों बेटे राजीव और संजय वहीं पढ़ रहे थे, फिर लंदन में रहकर वह अपने संस्कृति और कला के शौक को भी ज्यादा आगे बढ़ा पातीं।

तभी कुछ ऐसा हुआ कि श्रीमती गांधी ने अपने देश में ही रहने का फैसला किया। जनवरी 1966 में दिल के दौरे से शास्त्री की मौत के बाद उनसे प्रधानमंत्री की कुर्सी संभालने को कहा गया। इस जिम्मेदारी के लिए ‘सिंडीकेट’ ने उन्हें चुना था, जो तब सत्ताधारी कांग्रेस को चलाने वाले चालाक बूढ़ों का समूह था। उनका गणित यह था कि नेहरू की बेटी का राज्यारोहण कम समय में दो प्रधानमंत्रियों की मौत से आहत देश के लिए मरहम का काम करेगा। साथ ही, राजनीति में नौसिखिया होने के कारण उन्हें अपने हिसाब से चलाया जा सकेगा।

शुरुआत जरूर हिचकिचाहट भरी रही, लेकिन समय के साथ श्रीमती गांधी का आत्मविश्वास बढ़ता गया। 1969 में उन्होंने खुद को इतिहास की प्रगतिशील ताकतों की प्रतिनिधि और सिंडीकेट को प्रतिक्रियावादियों का झुंड करार देते हुए खुद को उनके शिकंजे से आजाद कर लिया। उन्होंने बैंकों, खदानों और तेल कंपनियों का राष्ट्रीयकरण किया, पूर्व महाराजाओं की पदवियां और विशेषाधिकार खत्म कर दिए और ‘गरीबी हटाओ’ के रोमांचक नारे पर 1971 का आम चुनाव भारी बहुमत से जीत लिया। चुनाव जनवरी में हुए और उसी साल के आखिरी महीने में उन्होंने पाकिस्तान पर भारत की सैन्य फतह में सबसे अहम भूमिका अदा की, जिससे पड़ोसी मुल्क के दो टुकड़े हो गए और स्वतंत्र बांग्लादेश का जन्म हुआ।

मध्यवर्ग के एक निश्चित हिस्से में श्रीमती गांधी की लोकप्रियता कायम है। अंग्रेजी पत्रिकाओं के जनमत सर्वेक्षणों में उन्हें आमतौर पर ‘भारत की सर्वकालीन श्रेष्ठतम प्रधानमंत्री’ चुना जाता है। यह अनुमोदन मुख्य रूप से 1971 की लड़ाई में उनके प्रदर्शन पर आधारित है, जिसे 1962 में चीन के साथ सीमा युद्ध के दौरान उनके पिता के विनाशकारी नेतृत्व की तुलना में देखा जाता है। दूसरे इसलिए उनकी तारीफ करते हैं क्योंकि वह सारे देश के साथ एकाकार थीं (जन्म और कर्म से उत्तर भारतीय होते हुए भी दक्षिण से उन्हें खास लगाव था)।

समाजवादियों को उनकी गरीब समर्थक लफ्फाजी मोहित करती है। दूसरी ओर, कई हिंदुस्तानी ऐसे भी हैं जो श्रीमती गांधी की विरासत के प्रति उत्साह महसूस नहीं करते। वे उनकी सत्तावादी प्रवृत्तियों की ओर इशारा करते हैं, जो उनके चमत्कारिक साल 1971 के बाद उभरीं। अब वह ‘प्रतिबद्ध नौकरशाही’ और ‘प्रतिबद्ध न्यायपालिका’ की मांग करने लगीं और इन दोनों स्वायत्त संस्थाओं को उन्होंने सत्तारूढ़ नेताओं के इशारे पर नचाने की चेष्टा की। 1974 में सम्मानित गांधीवादी जयप्रकाश नारायण ने सरकार में भ्रष्टाचार के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन छेड़ा।

जून 1975 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने प्रधानमंत्री को चुनावी कदाचरण का दोषी पाया। इस दोहरी राजनीतिक और न्यायिक चुनौती के जवाब में श्रीमती गांधी ने देश में आपात स्थिति की घोषणा कर दी, प्रेस पर सेंसर लगा दिया और सैकड़ों विरोधी राजनीतिज्ञों को जेल में डाल दिया। आपात स्थिति जनवरी 1977 तक जारी रही। मार्च में हुए चुनाव में चार अलग-अलग पार्टियों से मिलकर बनी जनता पार्टी के हाथों कांग्रेस का सफाया हो गया। नई सरकार तीन साल भी नहीं चल सकी और अपने ही अंतर्विरोध के बोझ से भरभराकर गिर गई। 1980 में श्रीमती गांधी और कांग्रेस ‘स्थिरता’ के नारे पर सत्ता में लौटीं।

उनके चौथे कार्यकाल के पहले दो साल घटनाविहीन थे, पर आंध्रप्रदेश में उन्हें असंतोष, पूवरेत्तर में अलगाववादी हलचलों और पंजाब में पृथकतावादी विद्रोह का सामना करना पड़ा। उस वक्त कहा जाता था कि प्रधानमंत्री ने पंजाब में उपद्रवों को जानबूझकर हवा दी ताकि 1985 में होने वाले चुनाव में वह अपने को भारत और अराजकता के बीच दीवार बनकर खड़े शख्स की तरह पेश कर सकें। जून 1984 में उन्होंने स्वर्ण मंदिर में, जहां सिख आतंकवादियों के एक गुट ने कब्जा कर लिया था, सैन्य कार्रवाई का हुक्म दिया। आतंकवादी मारे गए, पर कार्रवाई में परिसर की दूसरी सबसे पवित्र इमारत क्षतिग्रस्त हो गई। पांच महीने बाद दो सिख सुरक्षा गार्डो ने जाहिर तौर पर बदला लेने के लिए प्रधानमंत्री को गोलियों से छलनी कर दिया।

‘मैं देखता हूं कि संगमरमर ने कई पापों को छिपा रखा है।’ यह एल्डस हक्सले ने ताजमहल को देखकर कहा था। इसी तरह, शहादत से परिपूर्ण मौत के चलते इंदिरा गांधी का ऐसा मृत्योपरांत मूल्यांकन हुआ, जो उनकी कई गलतियों को या तो अनदेखा या उनसे उन्हें दोषमुक्त कर देता है। इसमें कोई शक नहीं कि वह संपूर्ण देशभक्त थीं। 1971 के शरणार्थी संकट (जब 90 लाख पूर्वी पाकिस्तानी भागकर भारत आ गए थे) और उसके बाद होने वाले युद्ध के दौरान उन्होंने भव्य साहस के साथ भारत का बेहतरीन नेतृत्व किया।

उनकी गलतियों में सबसे ऊपर सार्वजनिक संस्थाओं को तहस-नहस करना है। नेहरू के वक्त में नौकरशाही और न्यायपालिका राजनीतिक दखलंदाजी से महफूज थीं। श्रीमती गांधी ने बिल्कुल अलग और बेहद नुकसानदायक परंपरा शुरू की जिसमें मंत्री, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री जुड़ाव व निष्ठा के आधार पर अधिकारियों की जिम्मेदारियां तय करने लगे। इस ढंग से जिन संस्थाओं को चोट पहुंची, उनमें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भी थी। नेहरू के वक्त में कांग्रेस सचमुच विकेंद्रित और लोकतांत्रिक पार्टी थी। श्रीमती गांधी ने कांग्रेस को खुद अपनी परछाई में बदलने के लिए हर संभव काम किया। इतना ही नहीं, वह जानती थीं कि वह अमर नहीं हैं और चूंकि वह किसी अन्य व्यक्ति पर पूरी तरह विश्वास नहीं कर सकती थीं, इसलिए अपने बेटों को राजनीति में लाईं।

1960 के दशक के आखिर तक भारत ने आत्मनिर्भर आर्थिक विकास को बढ़ावा देकर औद्योगिक क्षमता और प्रौद्योगिकीय आधार का निर्माण किया था। जगदीश भगवती सरीखे अग्रणी अर्थशास्त्री उस वक्त औद्योगिक लाइसेंस प्रणाली को खत्म करने और विदेश व्यापार को बढ़ावा देने का आग्रह करने लगे थे। लेकिन अर्थव्यवस्था को सरकारी नियंत्रण से आजाद करने के बजाय श्रीमती गांधी ने उस पर राज्यव्यवस्था का शिकंजा और भी ज्यादा कस दिया जिससे जैसा कि अपेक्षित ही था अक्षमता और भ्रष्टाचार फला-फूला। 1991 में आखिरकार अर्थव्यवस्था के दरवाजे खोले गए, लेकिन इस बीच राष्ट्र के कीमती दो दशक विचारधारात्मक कट्टरता और निजी सनक पर कुर्बान कर दिए गए।

महान देशभक्त, लेकिन लोकतंत्र को गहरा नुकसान पहुंचाने वाली शख्सियत। इतिहास इंदिरा गांधी को शायद इसी रूप में याद रखेगा।

-लेखक जाने-माने इतिहासकार हैं।

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