चंडीगढ़. पुलिस अधिकारियों को फुटबॉल की तरह यहां से वहां किक ना करने की देश केगृहमंत्री पी. चिदंबरम की नसीहत का शायद पंजाब में कोई असर नहीं। अमृतसर के एसएसपी कुंवर विजय प्रताप सिंह का तबादला हो गया, क्योंकि उनकी वहां के भाजपा विधायक अनिल जोशी से अनबन थी। प्रशासनिक व्यवस्था पर राजनितिक दबाव जीता और एसएसपी को शंट कर दिया गया है।
अमृतसर पुलिस ने दिवाली के मौके उन लोगों को हिरासत में लिया था जिनसे पुलिस को अशांति की आशंका थी। अनिल जोशी का कहना था पुलिस अधिकारी उनके लोगों को निशाना बना रहे हैं और शहर में फोटो सहित लगे विकास कार्यो वाले बोर्डस हटवा रहे हैं। एसएसपी सिंह झुकने को तैयार नहीं थे और जोशी ने अपनी अनबन को अनशन का रूप दे डाला। जोशी भाजपा के विधायक हैं और उनकी सरकार में हिस्सेदारी है। नतीजा यह हुआ कि कुंवर विजय प्रताप सिंह को चंडीगढ़ में पंजाब आम्र्ड पुलिस की 82वीं बटालियन का कमांडेंट बनाकर भेज दिया गया।
पंजाब के पूर्व डीजीपी एस.एस. विर्क ने भास्कर से कहा, मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ, लोकतंत्र में राजनीति अफसरशाही पर हावी होती है और अफसरों को अक्सर यह सहना पड़ता है। वर्तमान डीजीपी ने कुछ नहीं कहा जबकि देश के गृहमंत्री ने पुलिस प्रमुखों से अपील की थी कि वे अपने मातहत अफसरों की तरफ से आवाज बुलंद करें।
सुप्रीम कोर्ट के आह्वान पर पुलिस अफसरों की नियुक्ति और ट्रांसफर के लिए गठित पुलिस एस्टेब्लिशमेंट बोर्ड की हिदायतों को राज्य सरकारों के नहीं मानने पर गृहमंत्री चिदंबरम ने कहा था, राज्य पुलिस प्रमुख क्यों चुप रहते हैं जब उनके मातहत अफसरों को सरकारें फुटबॉल की तरह किक देती हैं।
नाम न छापने की शर्त पर एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि सत्ता पक्ष का विधायक अगर चाहे तो अधिकारी का जीना मुश्किल कर देता है, क्योंकि अफसर का कार्यकाल फिक्स नहीं होता। विधायक हमेशा दबाव डालते हैं कि पुलिस अधिकारी उनके लोगों की करतूतों की अनदेखी करें। कुंवर विजय प्रताप सिंह ने किडनी काण्ड का खुलासा किया था और वे पिछले साल ही कम्यूनिटी पुलिसिंग के लिए अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार अवार्ड ने नवाजे गए थे।
राजनीतिक दवाब में किए गए बदलाव पर आईपीएस लॉबी में काफी रोष है। अधिकारियों का कहना है कि अधिकारियों का तबादला करने सरकार के अधिकार क्षेत्र में है लेकिन किसी विधायक के दबाव में आकर ऐसा नहीं करना चाहिए।
वर्तमान में करीब एक दर्जन जिलों के एसएसपी पदों पर आईपीएएस अधिकारी लगाने की बजाए पीपीएस को लगाया गया है। नियम ये है कि आईपीएस पद पर पीपीएस नहीं लगाया जा सकता। मानसा, पटियाला, बरनाला, फिरोजपुर खन्ना, मोहाली, मजीठा, तरनतारन, फरीदकोट, मुक्तसर और मोगा जिले में एसएसपी तैनात अधिकारी राजनीतिज्ञों के करीबी माने जाते हैं।
इस प्रकार की दखलंदाजी के चलते 11 आईपीएस अधिकारी डेप्युटेशन पर सेंटर में चले गए हैं। उधर विपक्ष भी पुलिस अधिकारियों पर बनाने जा रहे दबाव को गलत मान रहा है। प्रदेश कांग्रेसाध्यक्ष महिंदर सिंह केपी ने कहा कि अफसरों को खिलौना मानने वाली सरकार प्रदेश में शांति नहीं रख सकती, वे मामले को कंेद्र ले जाने की तैयारी में हैं।