भोपाल. एक नवंबर को मध्यप्रदेश के 53 वें स्थापना दिवस को बड़े पैमाने पर मनाए जाने की तैयारियां हैं। पूरे प्रदेश में सप्ताहभर तक ‘‘आइए, अपना मप्र बनाएं’’ इस अवधारणा के साथ एक नई कार्य संस्कृति और जवाबदेही के प्रति जागरूकता लाने पर जोर दिया जा रहा है। स्थापना दिवस के अवसर पर दैनिक भास्कर के साथ मुख्यमंत्री शिवराज सिंह
चौहान की विशेष बातचीत के प्रमुख अंश
प्रश्न : आप मप्र के विकास की बातें कर रहे हैं। इस स्थापना दिवस पर भी नए कार्यक्रमों की योजनाएं हैं। 1 नवंबर, 2009 का अलग महत्व क्या हैं?
उत्तर : कई वषों से स्थापना दिवस मनाए जा रहे हैं। इस बार मैं चाहता हूं कि यह सिर्फ रस्म या कर्मकाण्ड न रह जाए, वरन् प्रदेश में एकरूपता का जबर्दस्त भाव जगे और समाज के सभी वर्ग प्रदेश की उन्नति-प्रगति के लिए हाथ बटाएं, ऐसे प्रयास हों। मैं इस पूरे सप्ताह या महोत्सव को गैर सरकारी, गैर राजनीतिक रूप देना चाहता हूं। यह नागरिकों का अपना कार्यक्रम होगा। सरकार और आम आदमी की खाई पाटना जरूरी है। वैसे यह कार्यक्रम साल भर तक चलेंगे।
प्रश्न: प्रदेश में एकरूपता नहीं है? इससे क्या मतलब है?
उत्तर: हमारा प्रदेश बहुत ही विस्तृत है। मालवा से विंध्य बहुत दूर है। वहां की संस्कृतियां बिल्कुल अलग हैं। कई बार ऐसा महसूस होता है जैसे कि हम अलग-अलग प्रदेशों में रह रहे हैं। तो बड़ी चुनौती यह है कि पूरे प्रदेश में ‘अपना प्रदेश’ की भावना उत्पन्न हो। उसी से प्रदेश के असली विकास की शुरुआत होगी, ऐसा मेरा मानना है। उन क्षेत्रों की जरूरतें अलग-अलग हो सकती हैं, पर सभी नागरिक एक प्रदेश के हैं यह भावना और फिर उस आधार पर काम हों तो निश्चित अच्छे नतीजे आएंगे।
प्रश्न : ‘अपना प्रदेश’ की भावना 50 साल के बाद सरकार के ध्यान में आ रही है?
उत्तर : मैं पुरानी बातों में नहीं जाना चाहता हूं पर जब से मैं मुख्यमंत्री बना हूं हमेशा यह बात मुझे परेशान करती रही है कि जैसा एक आम गुजराती व्यक्ति अपना गुजरात मानता है, महाराष्ट्रियन व्यक्ति महाराष्ट्र को अपना प्रदेश मानता है, वह भावना मध्यप्रदेश में उत्पन्न नहीं हो पाई। उसे पैदा करना बड़ी चुनौती है और उसी चुनौती के साथ यह काम 1 नवंबर से प्रारंभ कर रहे हैं। सभी का साथ इसमें जरूरी है।
प्रश्न: मुख्यमंत्री के कहने भर या सरकार के कार्यक्रमों से तो यह भावना रातों-रात नहीं जग पाएगी। प्रगति की यह नई राह है। कैसे संभव होगा यह?
उत्तर : मैं जनता को, समाज के सभी वर्गो को साथ में लेना चाहता हूं। आम आदमी को भी यह भावना अपनाना होगी कि मप्र मेरा प्रदेश है। मैं बिजली बचाऊंगा, पानी बचाऊंगा, भ्रष्टाचार नहीं करूंगा, खेती-किसानी ईमानदारी से करूंगा, टैक्स चुकाऊंगा। इस तरह की जागरूकता पैदा करने की इच्छा है हर इंसान में। जैसे इंदौर शहर में गाजरघास खूब हो रही है, प्रदूषण भी खूब है, क्यों नहीं इंदौर के नागरिक प्रण लेते कि हम इसे खत्म करंेगे। किसी सरकारी स्कूल में साफ-सफाई हो यह वहां के अध्यापक और छात्र क्यों नहीं कर सकते? रास्ते पर हम थूकेंगे नहीं, प्लास्टिक नहीं फैंकेंगे . . . . इसमें सरकार कहां आती है? प्रश्न : तो क्या सरकारी योजनाएं, अधिकारियों की बड़ी फौज यह सब करने में असफल हो चुकी है?उत्तर : आप भी जानते हैं, सरकार की अपनी सीमाएं होती हैं। हर काम सरकार करे और नागरिक अपनी जबावदारियों से दूर भागे, यह जमाना बीत चुका है। मैं सिक्किम और गोवा गया। वहां की साफ-सफाई से मैं प्रभावित हुआ। महाराष्ट्र में स्वयंसेवी संस्थाओं का बड़ा काम है। आंध्रप्रदेश और छत्तीसगढ़ में गरीबों के मकानों का अलग पैटर्न है। दक्षिण के राज्यों में भाषा के कारण लोग जुड़े हैं। यह सब मप्र में भी संभव है यदि नागरिक अपनी जबावदारी को समझे।
प्रश्न : तो मंत्रीगण और अधिकारियों की इसमें कोई भूमिका नहीं है?
उत्तर : ऐसा तो मैं नहीं कहूंगा। उनकी भूमिका अधिक महत्वपूर्ण है। क्यों नहीं हमारे मंत्री पंच, सरपंच, विधायक यह सोचें कि वे 18 घंटे काम करेंगे, पूरी ईमानदारी से प्रदेश के विकास में जुट जाएंगे? अधिकारियों में भी एक नई कार्य संस्कृति की आवश्यकता है। जनता के साथ हिलमिल कर उन्हें काम करना होगा। जोश, जिद, जुनून और जज्बा सभी में जगाना होगा।
प्रश्न : पुन: बात इसी स्थापना दिवस की। इसमें और पिछले स्थापना दिवसों में क्या बड़ा फर्क है?
उत्तर : एक नई कार्य संस्कृति के विकास का प्रण लेना है। नई चेतना जगाना है अपने मप्र को आकार देने की। मुरैना से बालाघाट और नीमच से सीधी तक प्रदेशवासी एक सूत्र में बंधे, स्थानीय विकास में सरकार का हाथ बटाएं और अपने-अपने कामों के साथ, एक घंटा ईमानदारी से प्रदेश को दें तो मुझे लगता है नया मप्र, अपना मप्र बनने में कोई रुकावट नहीं है।