जयपुर. तेल डिपो में लगी आग पर काबू पाने में आईओसीएल का डिजास्टर मैनेजमेंट (आपदा प्रबंधन) पूरी तरह फेल रहा। शुरुआती जांच में ही कई सवाल खड़े हो गए हैं। जब डिपो में लगे वाल्व खराब थे और उसमें लीकेज भी था, तो उनको खोला ही क्यों गया? वे बंद ही रहते तो पेट्रोल हवा के संपर्क में आकर वाष्पित (गैस में बदलना) नहीं होता और आग इतना भयानक रूप नहीं लेती।
आग लगने के कारणों की जब पड़ताल की तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। विशेषज्ञों की मानें तो डिपो में आग रोकने के पर्याप्त इंतजाम थे ही नहीं। प्रशासन ने आग से निबटने के लिए सेना तो बुला ली, लेकिन न तो फायरविशेषज्ञों से संपर्क किया गया, न ही तत्काल मथुरा रिफाइनरी से मदद ली गई। रिफाइनरी में पर्याप्त मात्रा में फोम मौजूद था, जिसे पीपों (टैंक) में भरने से आग कंट्रोल में आ जाती। शुरुआती दौर में ओएनजीसी के हेलीकॉप्टर से भी फोम को भरकर आग रोक सकते थे।
फायर एंड डिजास्टर विशेषज्ञ मध्यप्रदेश शासन के डीएस तोमर की मानें तो जयपुर के आईओसीएल प्लांट में लगा ऑटोमेटिक फोम पोरर सिस्टम काम नहीं कर रहा था। डिपो में फास्टएड फायर बैकिंग व्यवस्था भी नहीं थी। अगर फोम पोरर सिस्टम चालू होता तो 60 डिग्री तापमान पहुंचने पर अपने आप वह आग बुझाने लगता। बकौल तोमर, पेट्रोलियम मंत्रालय के नियम के अनुसार डिपो में आपदा से निबटने के लिए कुल लागत का 33 फीसदी खर्च करना होता है।
इसमें डिपो के अंदर विंड फायर तथा सेफ्टी वाल्व अलग-अलग होना चाहिए। यही नहीं, प्लांट के ऊपर से हाइटेंशन वायर भी नहीं निकलना चाहिए। इसके बाद ही टर्मिनल को पेट्रोलियम मंत्रालय, जिला दंडाधिकारी और फायरब्रिगेड से एनओसी जारी करते हैं, लेकिन यहां इसकी अनदेखी हुई।
जयनारायण व्यास विवि के रिटायर्ड साइंस डीन बी.एस.पालीवाल कहते हैं कि डिपो बनाने के दौरान ही आईओसी को हर टैंक के नीचे एक इमरजेंसी आउटलेट बनाना चाहिए था, ताकि आग लगने के दौरान तेल को उसके जरिए रास्ते बाहर निकाल दिया जाता।
इसलिए लगी आग
विशेषज्ञों की राय में लीकेज के बाद पेट्रोल बाहर हवा के संपर्क में आया होगा और फिर गैस में तब्दील हो गया। यह गैस अपने आसपास एक अलग तरह का ज्वलनशील क्षेत्र बना लेती है, जिसके 15 से 20 फीट में एरिया में कोई भी बिजली उपकरण या जलती चीज संपर्क में आने से विस्फोट हो जाता है। डिपो में पहले तीन पीपों में आग नीचे की ओर लगी, जिसके कारण उनमें तेज धमाके हुए। इन पीपों में आग ऊपर की ओर से लगी, उनमें धमाके नहीं हुए।
जानकारों का कहना है कि इतने बड़े हादसों के लिए प्रोटीन फोम का इस्तेमाल सबसे उपयुक्त रहता है। यह फोम सामान्य फोम से ज्यादा शक्तिशाली होता है और जहां से आग निकलती है, उसके ऊपर एक ऐसा बादल जैसा आवरण बना लेती है कि आग वाले हिस्से से ऑक्सीजन खत्म हो जाती है।
ऐसी स्थिति में आग बुझ सकती है।
अब उठी सवालों की लपटें...
ऑटोमेटिक फोम पोरर सिस्टम बंद क्यों था?
* वाल्व जब लीग था तो उसे खोला ही क्यों गया?
* डिपो में फास्ट एड फायर बैकिंग की व्यवस्था नहीं थी और न ही ऑटोमेटिक फोम पोरर सिस्टम काम कर रहा था।
* अगर डिपो में ऑटोमेटिक फोम पोरर सिस्टम चालू हालत में होता तो 60 डिग्री तापमान होने पर यह अपने आप आग बुझाने लगता।
* प्रशासन ने फायर ब्रिगेड के विशेषज्ञों से संपर्क नहीं किया और न ही मथुरा रिफाइनरी से कोई मदद ली, जबकि मथुरा रिफाइनरी में पर्याप्त मात्रा में फोम मौजूद था, जिसे भरने से आग कंट्रोल में आ जाती।
* शुरुआती दौर में ओएनजीसी के हेलिकॉप्टर से भी फोम भरकर आग रोकी जा सकती थी।
* लीकेज की सूचना गुरुवार शाम 4:30 बजे मिल गई थी, बावजूद इसके नहीं रोक पाए आग।
अब आग में फोम डालना खतरनाक
आग बुझाने के लिए फोम डालना अभी खतरनाक हो सकता है। ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार आईओसीएल के जिन टैंकों में ऊपर-नीचे दोनों ओर आग लगी है, उनमें फोम डालने से आग और ज्यादा भड़क सकती है और धमाका हो सकता है। टैंक के ऊपरी हिस्से में फोम डालकर ऊपर की आग तो बुझाई जा सकती है, लेकिन टैंक के निचले हिस्से में लगी आग नहीं बुझती है। ऐसी स्थिति में टैंक के निचले हिस्से में धमाका होने से हालात बेकाबू हो सकते हैं।
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