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बेहतर है कभीकभार अपनी सिक्स्थ सेंस का इस्तेमाल
एन रघुरामन Sunday, November 01, 2009 00:10 [IST]  

मुंबई में पवई स्थित हमारी सोसायटी में दो पालियों में तकरीबन 16 गार्ड पहरा देते हैं। मैं उन्हें चेहरे से जानता हूं, लेकिन तभी पहचान पाता हूं, जब वे यूनिफॉर्म में होते हैं। मैं रोज अपने प्यारे पपी (जिसका नाम पिक्सी है) के साथ सुबह की सैर पर निकलता हूं। रास्ते में तीन-चार और कुत्ते हमारे साथ हो लेते हैं। इस सोमवार की सुबह भी कुछ अलग नहीं हुआ। जैसे ही मैं सैर के लिए निकला, तीन कुत्ते हमारे साथ लग गए और हमने रोज की तरह टहलना शुरू कर दिया।



लेकिन कुछ ही कदम चलने के बाद मैंने गौर किया कि ये कुत्ते अपनी नियमित चाल से चलने की बजाय एक व्यक्ति को देखकर विचलित हो गए, जो धीरे-धीरे लंगड़ाते हुए एक गार्ड की ओर चला जा रहा था। जैसे ही वह व्यक्ति गार्ड के पास पहुंचा, हमारे पीछे चलने वाले कुत्ते दौड़कर उसके पास पहुंच गए और उसे सूंघने लगे। पूरी तरह संतुष्ट होने के बाद वे अपनी पूंछ हिलाते हुए उस शख्स के इर्द-गिर्द खड़े हो गए।



स्वाभाविक तौर पर मुझे उस व्यक्ति के बारे में जिज्ञासा हुई। आखिर यह व्यक्ति कौन है जिसने इन कुत्तों को सम्मोहित कर दिया? इससे भी अहम बात यह कि यदि वह कुत्तों से इतना प्यार करता है और सुबह की सैर पर आता है तो अब तक मेरा इससे कभी वास्ता क्यों नहीं पड़ा? मेरे ख्याल से मेरे पालतू पपी ने मेरी दुविधा को भांप लिया और बाकी सभी कुत्तों की तरह मेरे इस वफादार साथी ने भी मेरी उलझन को दूर करने का फैसला किया।



मेरा पपी मुझे उस व्यक्ति की ओर ले गया। मैंने देखा कि वह अपंग व्यक्ति कुत्तों के साथ खेल रहा है। उनके प्रति उसका दुलार स्वाभाविक नजर आ रहा था। अब तक मैं उसे पहचान चुका था। वह उन 16 सुरक्षा गार्डस में से एक था लेकिन मैंने उसे हाल के दिनों में नहीं देखा था। यहां तक कि दिवाली की बख्शिश दिए जाने के मौके पर भी वह कहीं नजर नहीं आया था। उसने बताया कि छह महीने पहले वह लकवे का शिकार हो गया और इस वजह से उसे अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा। मैंने अपने पड़ोस में भी इसके बारे में कुछ नहीं सुना था। उस गार्ड ने कहा, ‘अब मैं वापस आ गया हूं, लेकिन पूरी तरह फिट नहीं हूं। मेरी हालत में धीरे-धीरे सुधार होगा।’ मैं कुछ कहने की स्थिति में नहीं था।



मैं कुत्तों से घिरे उस शख्स को छोड़कर लौट आया। ये उसके कुत्ते थे। उसके अकेलेपन के साथी। कुत्ते न सिर्फ मेरे प्रति, बल्कि वहां रहने वाले तमाम लोगों के प्रति वफादार हैं और उन्होंने उस दिन मेरे लिए एक और अच्छा काम किया। उन्होंने मुझे उस दिन एक और वफादार जीवात्मा को दिखाया, जिसे मैं भूल चुका था।



हाल ही में जब मैंने पेंटर ए. बालासुब्रण्यम का एक साक्षात्कार देखा, तो मुझे वे कुत्ते और वह अकेला शख्स फिर याद आ गया। बालासुब्रण्यम ने अपने साक्षात्कार में कहा- मान लीजिए कि आप किसी पार्क में टहल रहे हैं। वहां पत्तियों से छनकर आती सूर्य की रोशनी को आप तब तक नहीं देख सकते, जब तक अपने सामने कोई कागज या ऐसा कोई और माध्यम नहीं रखते। इस तरह यह प्रकाश कागज पर दिखने लगता है। आपने शायद पहले प्रकाश को इस तरह देखने पर गौर नहीं किया होगा।



ऐसा इसलिए क्योंकि दुनिया में ऐसा कोई स्पष्ट माध्यम नहीं है जो इस रोशनी को पकड़कर इसे दिखा सके। हमें उससे परे देखने की भी कोशिश करनी चाहिए जिनकी अनुभूति अपनी पांच ज्ञानेंद्रियों के जरिए होती है और इस तरह ही हम हकीकत जान सकते हैं। मैंने उन कुत्तों, उस अपंग व्यक्ति और अंधेरे व उजाले के खेल के बारे में सोचा। उन कुत्तों ने ही वास्तव में मुझे बताया कि वह शख्स कौन था।

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