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Sunday, November 01, 2009 00:41 [IST]  

danik bhaskarआंखों में फिर जज्ब हुआ इक दर्द का मंजर

नक्श इलाहबादी

आंखों में फिर जज्ब हुआ इक दर्द का मंजर औरआज एक ही बूंद में डूबा एक समंदर और

रब्त मेरा जब बाहर की दुनिया से टूटता हैइक संसार जनम लेता है मेरे अंदर और

फ़िक्र-ओ-घुटन बेव़क्त की दस्तक बेरब्त आवाजेंइसके अलावा देता भी क्या मुझको मेरा घर और

उसकी झुलसती रूह पे रख दो मेरे बदन की छांवमेरे पिघलते जिस्म पे लिख दो एक दोपहर और

उसका आख़िरी तीर बचा है मेरी आख़िरी सांसकहर बहर सूरत टूटेगा एक न इक पर और

सुब्ह की पहली किरन तलक मैं बन जाऊंगा ़ख्वाबतू भी मुझमें कर ले बसेरा सिर्फ़ रात भर और

मायनेरब्त=संबंध, दोस्ती, तआल्लुक/बेरब्त=बेढंगी, बेमेल /बहर=समुद्र

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