आंखों में फिर जज्ब हुआ इक दर्द का मंजर
आंखों में फिर जज्ब हुआ इक दर्द का मंजर औरआज एक ही बूंद में डूबा एक समंदर और
रब्त मेरा जब बाहर की दुनिया से टूटता हैइक संसार जनम लेता है मेरे अंदर और
फ़िक्र-ओ-घुटन बेव़क्त की दस्तक बेरब्त आवाजेंइसके अलावा देता भी क्या मुझको मेरा घर और
उसकी झुलसती रूह पे रख दो मेरे बदन की छांवमेरे पिघलते जिस्म पे लिख दो एक दोपहर और
उसका आख़िरी तीर बचा है मेरी आख़िरी सांसकहर बहर सूरत टूटेगा एक न इक पर और
सुब्ह की पहली किरन तलक मैं बन जाऊंगा ़ख्वाबतू भी मुझमें कर ले बसेरा सिर्फ़ रात भर और
मायनेरब्त=संबंध, दोस्ती, तआल्लुक/बेरब्त=बेढंगी, बेमेल /बहर=समुद्र










