धोनी की पारी से बहस पर लगा विराम
ayaz memon Sunday, November 01, 2009 01:05 [IST]  

आखिरकार महेंद्र सिंह धोनी ने साबित कर दिखाया कि वे कितने सख्त हैं, लेकिन केवल इसलिए नहीं कि उन्होंने सिर से टकराई पहली ही गेंद को बड़े ही आत्मविश्वास के साथ झेला। नागपुर में उनके द्वारा लगाया शतक न केवल मैच जीतने के लिए, बल्कि स्वयं पर बढ़ते दबाव को दूर करने के लिए भी जरूरी था।



उन्होंने दोनों ही दबावों का सामना बड़ी खूबी के साथ किया। जब किसी कप्तान को सभी ओर से सलाह मिलने लगती है, विशेषकर यह कि उन्हें किस क्रम पर बल्लेबाजी के लिए आना चाहिए, तो इसमें संदेश साफ है : उसकी बल्लेबाजी नहीं, बल्कि कप्तानी दांव पर लगी है।



यदि टीम जीत रही होती तो इस तरह की चर्चाएं अनावश्यक होतीं। शुरू के तीन स्थानों पर तेंडुलकर, सहवाग और गंभीर द्वारा बल्लेबाजी करने और युवराज की टीम में वापसी से इस बात पर बहस निर्थक थी कि धोनी को पांचवें स्थान के बजाय ऊपर के क्रम में बल्लेबाजी करनी चाहिए। लेकिन यह इस बात की ओर इशारा कर रही थी कि हाल के हफ्तों में टीम की असफलता से बेचैनी बढ़ती जा रही है।



जहां तक मुझे याद है, धोनी ऐसे तीसरे भारतीय कप्तान हैं, जिन्हें किसी अंतरराष्ट्रीय मैच में सिर पर गेंद लगी। मैं वर्ष १९६१-६२ में बारबाडोस में ‘चकर’ चार्ली ग्रिफिथ के बाउंसर से नारी कंट्रैक्टर को गिरते हुए नहीं देख पाया था (वह साहसी व्यक्ति उस कहानी को कहने के लिए जीवित रहा), लेकिन इस घटना ने ‘थ्रो’ गेंदबाजी पर बहस को नए मुकाम पर पहुंचा दिया था। सुरक्षा उपकरणों के बावजूद एक क्रिकेटर का सिर उसके शरीर का सबसे कमजोर हिस्सा रहा है।



इस खेल में दो ऐसी घटनाएं और रही हैं, जिसने खिलाड़ी को गंभीर नुकसान पहुंचने की संभावनाओं को खत्म किया है। 1970 के दशक के मध्य तक बल्लेबाजों ने हेलमेट पहनना शुरू कर दिया था। इसके बाद अगले एक दशक में यह नियम बनाया गया कि गेंदबाज एक ओवर में दो से ज्यादा बाउंसर नहीं कर सकेगा। कुछ का मानना था कि ऐसा ‘बॉडीलाइन’ के झटकों (और कंट्रैक्टर के घायल होने) की परिणति था, लेकिन बड़ी संभावना तो यही है कि ऐसा वेस्टइंडीज के तेज गेंदबाजों के ‘खौफ’ के प्रभाव को सीमित करने के मकसद से किया गया था।



धोनी के सिर पर प्रहार चरित्र और प्रतिक्रिया में अजहरुद्दीन के मामले के काफी निकट है, जो मैंने लार्डस में १९९क् में देखा था। पहले टेस्ट में इंग्लैंड के ६५३ रनों का पीछा करते हुए भारत तब संकट में था, जब कप्तान अजहरुद्दीन बल्लेबाजी करने मैदान में पहुंचे। वे लय में नजर नहीं आ रहे थे और इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं हुआ जब डेवोन मैलकम का बाउंसर उनके हेलमेट से जा टकराया।



लेकिन इससे अजहरुद्दीन अचानक जाग गए और फिर अगले कुछ घंटे उन्होंने ऐसा खेल दिखाया जिसे क्रिकेट के मक्का में बैठे दर्शकों ने लंबे समय तक याद रखा होगा। हालांकि उनकी शानदार १२१ रनों की पारी भी मैच नहीं बचा पाई। उधर, नागपुर में धोनी के शानदार प्रयासों की बदौलत भारत को जीत मिली और इससे यह वनडे सीरीज जीवंत बन सकी। इससे उन चर्चाओं पर भी विराम लग गया (फिलहाल के लिए ही सही) कि धोनी को किस स्थान पर बल्लेबाजी करने के लिए आना चाहिए।



पूर्व आस्ट्रेलियाई कप्तान रिची बेनो कहते हैं, ‘कप्तानी में 90 फीसदी किस्मत चाहिए और 10 फीसदी कौशल, लेकिन इसमें इस १क् फीसदी कौशल के बगैर हाथ नहीं आजमाना चाहिए।’ नागपुर के बाद धोनी की किस्मत में बड़ा बदलाव देखने के लिए उन्हें मोर्चे पर डटे रहकर कमान थामनी होगी।

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