पिछले एक दशक में सॉफ्टवेयर व आईटी के क्षेत्र में रोजगार के काफी अवसर पैदा हुए, लेकिन अब इंजीनियरिंग का क्षेत्र दोबारा बड़े कॅरियर विकल्प के रूप में उभर रहा है। स्पष्ट तौर पर इसका कारण देश के इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में बड़े पैमाने पर निवेश होना है। मौजूदा न्यूक्लियर पावर टेक्नोलॉजी की क्षमता वर्ष 2020 तक पांच गुना तक बढ़ाने की सरकार की योजना के साथ न्यूक्लियर इंजीनियरों की मांग में भारी इजाफा होने वाला है। एक मोटे अनुमान के मुताबिक इस क्षेत्र में प्रतिवर्ष 2000 से ज्यादा इंजीनियरों और 20000 से ज्यादा अन्य पेशेवर लोगों की दरकार है।
इसके अलावा यह देखते हुए मांग में और इजाफा हो सकता है कि इस क्षेत्र से जुड़ी दुनिया भर की दस से ज्यादा कंपनियां हमारे देश में अपनी निर्माण इकाइयां स्थापित करने जा रही हैं। इस क्षेत्र से जुड़े इंजीनियरों व अन्य प्रोफेशनल लोगों की यह मांग अगले 15 वर्र्षो तक बनी रहेगी। वास्तव में इस इंडस्ट्री को प्रति मेगावाट उत्पादन के लिए 1.4 व्यक्ति की दरकार है।
फिलहाल देश के तमाम कॉलेजों और आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से निकलकर आने वाले न्यूक्लियर इंजीनियरों और पीएचडी डिग्रीधारकों की संख्या मांग के हिसाब से महज 50 फीसदी है। इसके अलावा न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी कोर्स देश के कुछ विश्वविद्यालयों में ही उपलब्ध हैं और सिर्फ दो आईआईटी संस्थानों (मुंबई और कानपुर) में ही इस विषय को पढ़ाया जाता है।
एलएंडटी, बीएचईएल और एनपीसीआईएल जैसे संस्थान न्यूक्लियर तकनीक विशेषज्ञों की सेवाओं के सबसे बड़े ग्राहक हैं और साफतौर पर यहां अपनी शाखाएं स्थापित करने वाली विदेशी कंपनियां इन कंपनियों से उच्च मेहनताने पर दक्ष प्रोफेशनल्स को अपने यहां लेंगी।
कोई छात्र भले ही वर्ष 2010 से इस क्षेत्र में अपना कॅरियर शुरू करता है, वह 2016 तक अपनी पढ़ाई पूरी कर रोजगार के लिए तैयार होगा और तब भी इसकी मांग आज की तरह बनी रहेगी।