लोक संगीत का वैभव
Bhaskar News Monday, November 02, 2009 02:38 [IST]  

लोक संगीत का वास्तविक वैभव प्रदेश में ही जीवित है। लोक गीतों में समर्पण, प्रेम, शौर्य और चारित्रिक वैभव का जादू जागता है। ढोला मारू राजस्थान का मूल लोकसंगीत है लेकिन यहां मालवा, निमाड़ और बुंदेलखंड में जीवित है।

ढोला मारू का प्रेम, उनका बिछड़ना और वापस मिलना इस लोक संगीत में अपने तरीके से रूपायित होता है। कलगी तुर्रा मंडला, मालवा, बुंदेलखंड और निमाड़ में चंग और डफ की बीट्स पर गाया जाता है। महाभारत से लेकर पुराणों की कथाएं इसमें शामिल की जाती हैं। यह चंदेरी राजा शिशुपाल के जमाने से चला आया है।

संत सिंगाजी, कबीर, मीरा और दादू के निगरुणी भजनों की सौगात एकतारा और खड़ताल के जरिये जीवन पाती है। निमाड़ में फाग गाया जाता है। नवरात्रि में शक्तिरूपा की पूजा गरबा में रूपायित होती है। मालवा में भृर्तहरि की कविताएं गूंजती हैं। चिंकारा (सारंगी जैसा वाद्य) पर इनकी धुनें कमाल करती हैं।

यहीं पर संजा भी गाया और बनाया जाता है। बरसाती बार्ता भी मालवा में गाया जाता है। बुंदेलखंड वीरों की भूमि कहलाती है। यहां आल्हा ऊदल गाया जाता है। वीरता, ईमान और आल्हा ऊदल के 52 युद्ध इन गीतों में आकार पाते हैं। होली, ठाकुर, इसुरी, राई फाग भी गाने के वैभवशाली रूप हैं। देवरी भी दीवाली पर गाए जाने वाले गीत हैं जिनका वैभव भी अनूठा है।
  Bookmark and Share
 


अपने विचार यहां लिखें:
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: