चंडीगढ़. ये स्पेशल चिल्ड्रेन हैं, इन्हें हंसाना, बोलना, जिंदगी के सबक सिखाने पड़ते हैं, लेकिन अलग तरीके से। हम और आप जो बोलकर या सुनकर समझ सकते हैं, वह शायद इनकी समझ में न आए, लेकिन उंगली का एक हल्का सा इशारा ही काफी है इन्हें सब कुछ समझाने के लिए।
भास्कर ने स्पेशल चिल्ड्रेन के लिए सेक्टर-36 में बनाए गए सेंटर सोरम में ऐसे ही बच्चों के साथ वक्त गुजारा। इनमें कुछ बच्चे ऑटिज्म के शिकार हैं, तो कुछ स्लो लर्नर हैं। डाउन सिंड्रोम से पीड़ित बच्चे भी हैं। यहां बच्चों की क्लास चल रही थी। हम मिले ऑटिज्म से पीड़ित 10 साल के कुशल से, जो एक तार में कुछ बॉल्स को फंसा रहा था। उसके टीचर राके श ने बताया, ‘मैं आपसे जो बात कर रहा हूं या कुशल को जो बोल रहा हूं वो समझ नहीं पा रहा है।
मेरे इशारों को समझकर उसने तार में पांच बॉल फंसाए हैं, फिर नीडिल्स को इशारों के माध्यम से गिनती करके उनको एक बॉक्स में लगाया।’ कुशल को इस प्रकार गिनती सिखाने में राके श को 20 मिनट लगे। इस दौरान कुशल कई बार सीट से उठकर भागा और एक बार तो जमीन पर भी लेट गया। लेकिन, एक खास बात है कुशल ने पर्चियों के माध्यम से खुद अपना टाइमटेबल तय किया है।
जाह्न्वी को डाउन सिंड्रोम है। वह सबकुछ समझती है लेकिन क्लास में एक घंटे से ज्यादा रुकने के दौरान उसके मुंह से एक भी आवाज नहीं निकली। न ही उसने नजरें उठाकर देखा। टीचर स्नेह देवगन ने बताया बहुत शर्मीली है, हंसती तक नहीं। वहीं क्लास में एक खिलौने के साथ वक्त गुजार रहा ध्रुव स्लो लर्नर है। राकेश और स्नेह का कहना है कि इन बच्चों को कुछ सिखाना बहुत चैलेंजिंग जॉब है, लेकिन इनके साथ वक्त गुजारना अच्छा लगता है।
इनका कहना है कि, मकसद सिर्फ इन बच्चों को पढ़ाना-लिखाना ही नहीं है, बल्कि उनमें आत्मविश्वास जगाना भी है, ताकि आगे चलकर वह जिंदगी की मुश्किलों का सामना कर सकें। इसके लिए पेरेंट्स को भी मानसिक रूप से मजबूत होने की जरूरत है।