नई दिल्ली. देश में हर साल करीब चार लाख बच्चे निमोनिया के कारण मौत के मुंह में चले जाते हैं। यह संख्या एचआईवी/ एड्स, मलेरिया और खसरा से होने वाली कुल मौतों के आंकड़ों से भी कहीं अधिक है। विश्व निमोनिया दिवस (2 नवंबर) पर दुनिया भर के लगभग 100 बड़े स्वास्थ्य संगठन इस बीमारी से लड़ने के लिए विभिन्न देशों पर दबाव बना रहे हैं।
दिल्ली के एक स्वयंसेवी संगठन ‘सेव द चिल्ड्रन’ के सीईओ थॉमस चांडी के मुताबिक, निमोनिया बच्चों के लिए किसी और बीमारी से ज्यादा घातक है। इस जानलेवा बीमारी से दुनिया भर में हर साल करीब 20 लाख बच्चों की मौत होती है।
हर 15 सेकंड में मौत
आंकड़े बताते हैं कि विश्व में निमोनिया से हर 15 सेकंड में एक बच्चे की मौत होती है। पांच साल से कम उम्र के मरने वाले 20 प्रतिशत बच्चों की मौत का कारण निमोनिया ही है। अगर भारत की बात करें तो पश्चिम बंगाल और दिल्ली में निमोनिया से सबसे ज्यादा मौतें होती हैं।
जागरूकता की जरूरत
राम मनोहर लोहिया अस्पताल के डॉक्टर एम वली के मुताबिक, निमोनिया जैसी बीमारी को लेकर सरकार गंभीर है। बच्चों को निमोनिया से बचाने के टीके भी उपलब्ध हैं, लेकिन अभिभावकों को इस बीमारी के प्रति जागरूक करने की ज्यादा जरूरत है। डॉ. वली के मुताबिक,सिर्फ बच्चे ही नहीं, बूढ़ों में भी यह बीमारी काफी तेजी से फैलती है। ऐसे में मौसम बदलने के समय स्वास्थ्य का ज्यादा ध्यान रखना चाहिए।