संगीत का मध्यसप्तक
उमाकांत/रमाकांत गु Tuesday, November 03, 2009 02:34 [IST]  

शास्त्रीय संगीत एक ऐसी विलक्षण विधा है जो आदमी को आदमी से जोड़ने की अद्भुत ताकत रखती है। आज जब बात चल रही है कि फैले हुए मध्यप्रदेश में एकरूपता कैसे आएगी तो हमें लगता है संगीत वह प्रभावी माध्यम हो सकता है जो ऐसे राजनीतिक और सामाजिक प्रयासों को और आगे बढ़ाएगा।



मैहर हो या देवास, ग्वालियर हो या इंदौर, तानसेन के प्रदेश में संगीत की ऐसी परंपरा रही है कि हर नागरिक को उसका गर्व होना चाहिए। बात पिछले वर्ष की है। उस्ताद अली अकबर साहब के साथ सैन राफेल (अमेरिका) में उनके निवास पर हमारी मुलाकात हुई।



एक संगीत जलसे के सिलसिले में हम अमेरिका के अनेक शहरों में घूम रहे थे। हमारे ध्रुपद गायन को सुनने सैकड़ों में संगीत प्रेमी उमड़ रहे थे और कईयों को यह जानकर सुखद अनुभूति हो रही थी हम तीनों गुंदेचा बंधु आगर मालवा के हैं, इंदौर-उज्जैन से जुड़े हैं और कई वषों से भोपाल में अपना निजी गुरुकुल चला रहे हैं।



अली अकबर खां साहब ने जिस आत्मीयता से मप्र के हाल जाने, लोगों के बारे में, संगीत के बारे में पूछा हम लोग गद्गद हो गए। उन्होंने अपने, पंडित रविशंकरजी के साथ मैहर(सतना) में बिताए दिनों की खूब यादें कुरेदी। उन्हें अपने मध्यप्रदेशी होने का बड़ा गर्व था।



यह गौरतलब है कि जिस तरह संगीत का मुख्य केंद्र उसका मध्य सप्तक होता है उसी तरह हमारे देश की सांगीतिक विरासत का केंद्र भी मध्यभारत और मध्यप्रदेश रहा है तो यह पिछड़ कैसे सकता है।



सांस्कृतिक परंपरा जारी...



क्या यह हमारे लिए सौभाग्य का अवसर नहीं है कि आज जब भी देश में कहीं भी कला एवं संस्कृति की चर्चा होती है तो मध्यप्रदेश को शामिल किए बगैर वह पूरी नहीं होती। जब मध्यप्रदेश बना था तब भी मध्यप्रदेश के कलाकारों द्वारा हिंदुस्तान के सांस्कृतिक परिदृश्य में एक अहम भूमिका निभाई जा रही थी, आज भी वह बदस्तूर जारी है।



शास्त्रीय संगीत की सृजनात्मक यात्रा और उसके उन्नयन में मध्यप्रदेश की भूमिका अनन्य योगदान रहा है। आज हमारे देश की शास्त्रीय गायकी के अधिसंख्य गायकों की सृजनात्मक प्रतिभा पर जिन दो महान संगीत पुरोधाओं का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है ऐसी दोनों महान विभूतियों- उस्ताद अमीर खां और पंडित कुमार गंधर्व- का मालवा की भूमि- इंदौर और देवास से बहुत गहरा संबंध रहा है। आज संगीत में इन दोनों के नाम से अपने-अपने घराने भी स्थापित हो चुके हैं।



शास्त्रीय वादन के क्षेत्र में मैहर का नाम आज पूरी दुनिया में बहुत सम्मान के साथ लिया जाता है। मैहर घराने के संस्थापक उस्ताद अलाउद्दीन खां का भारतीय संगीत में जो अवदान है वह पंडित रविशंकर और उस्ताद अली अकबर खां जैसे उनके दिग्गज शिष्यों के रूप में प्रकट हुआ।



भारतीय संगीत को वैश्विक पहचान दिलाने में इन दोनों की मुख्य भूमिका रही है। गायकी के जो विभिन्न घराने आज हमारे देश में स्थापित हुए हैं उनकी जननी है मध्यप्रदेश का ग्वालियर घराना। घराने के ऐसे समृद्ध रूप को पंडित शंकर पंडित ने एक नई पहचान दी।



हमारे प्रदेश के जिन महान संगीतकारों का स्मरण किए बगैर नहीं रहा जा सकता उनमें उस्ताद रजब अली खां देवास वाले, तबला वादक उस्ताद जहांगीर खां, पखावज वादक पंडित कालिदास पंत आगले, ग्वालियर के उस्ताद हाफिज अली खां, पंडित बाला भाऊ उमड़ेकर/कुंडल गुरु/पंडित राजा भैया पूछवाले, पंडित कृष्णराव शंकर पंडित, जावरा के तबला वादक उस्ताद अजीम खां आदि के नाम प्रमुख हैं। शास्त्रीय संगीत की शिक्षा के माध्यम से उसके प्रचार प्रसार में भी ग्वालियर घराने का अविस्मरणीय योगदान रहा है।



कथक नृत्य की महान परंपरा को सहेजने और कथक की एक नई परंपरा को जन्म दिया रायगढ़ के कला प्रेमी राजा चक्रधर सिंह ने। इसी रायगढ़ घराने की परम्परा को जीवित रखते हुए पंडित कार्तिकराम और कल्याणदास की जोड़ी ने कथक नृत्य को एक नया आयाम दिया।



आज देश में यदि रसिकता के नाम पर महाराष्ट्र, सांगीतिक कौशल के नाम पर बंगाल और संगीत के सामाजिक संस्कार के लिए दक्षिण को याद किया जाता है तो कला संस्कृति के सृजन और उसके पोषण के लिए मध्यप्रदेश को देश में सबसे अग्रणी माना जाता है।



संस्कृति के संरक्षण के लिए राजकीय प्रयासों को मध्यप्रदेश ने एक नई परिभाषा दी। पूरे देश में एक सांस्कृतिक जागरण के लिए हमारी प्रदेश सरकार ने जो 70 के दशक में अलख जगाया उसका अनुकरण पूरे देश ने किया।



यह पहला अवसर था जब इतने बड़े पैमाने पर किसी राज्य सरकार ने इतनी सारी अकादमियों की स्थापना की और संस्कृति के अलग-अलग क्षेत्रों में काम किया। प्रदेश की इस सांस्कृतिक यात्रा में एक समय ऐसा भी आया जब पूरे देश के कलाप्रेमी हमारे प्रदेश को आदर्श के रूप में देखते थे।



तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने तो अभिभूत होकर हमारे प्रदेश को कला की राजधानी कह डाला था। भारत भवन के माध्यम से सारी कलाओं को एक छत के नीचे सजने संवरने का मौका मिला। ऐसा पहली बार हुआ था।



पुरस्कारों की लंबी फेहरिस्त आज जो देश में देखने को मिलती है उसकी शुरुआत हमारे प्रदेश में कालिदास सम्मान से हुई थी। किसी राज्य सरकार ने पहली बार इस तरह के सम्मान की स्थापना की थी जिसमें 1 लाख रुपए की राशि पुरस्कार के रूप में दी गई।



लुप्त होती कलाओं को बचाने का पहली बार बीड़ा मध्यप्रदेश ने ही उठाया था। आज ध्रुपद संगीत देश और विदेश में यदि फिर से संगीत की मुख्यधारा में शामिल हुआ तो इसका श्रेय मध्यप्रदेश को ही जाता है। सारंगी, वीणा और पखावज जैसे दुर्लभ वाद्य को हमारे प्रदेश ने एक खास तवज्जो दी है।



प्रदेश की स्थापना के 53 वर्ष बाद यदि आज प्रदेश के सांगीतिक परिदृश्य को देखें तो हम पाएंगे कि गायन और वादन के प्रत्येक क्षेत्र में संगीत की एक नई पीढ़ी तैयार हुई है जिसने देश में अपनी पहचान बनाई है। ये प्रदेश सरकार के प्रयासों के सीधे या परोक्ष परिणाम ही हैं।



प्रदेश में पहली बार...



सांगीतिक कार्यक्रमों की एक विशाल श्रंखला का सिलसिला हमारे प्रदेश ने पहली बार शुरू किया। जिसमें प्रदेश और देश के कलाकारों को अपनी कला के प्रदर्शन के लिए भरपूर अवसर मिले। अन्य राज्यों ने मध्यप्रदेश से प्रेरणा लेकर इसी तरह के कई कार्यक्रम शुरू किए।



हमारे प्रदेश के तानसेन संगीत समारोह और खजुराहो नृत्य समारोह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुके हैं। संस्कृति की इस बहती धारा को पोषित करने का कार्य हमारी राज्य सरकार आज भी भलिभांति कर रही है। मप्र की स्थापना के 54 वें साल में खड़े होकर हम भविष्य की ओर इस उम्मीद से देख रहे हैं कि जिस महान विरासत को हम आज तक लेकर चले हैं।



उसे हम लगातार सींचते रहेंगे। कला कि जिन बुलंदियों पर मध्यप्रदेश शुरू से रहा है उसे हम और आगे ले जाएं। श्रेष्ठता के जिन मानदंडों को लेकर प्रदेश ने अपनी पहचान बनाई है वे और अधिक विकसित तथा पल्लवित हो। संगीत अजेय है। हमारा मध्यप्रदेश भी अजेय रहेगा।

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