रायपुर. रविवार को मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने बदेशा को पुरस्कार के फैसले को ही खारिज कर दिया था। अब विभाग पूरे मामले की पड़ताल में जुट गया है कि डॉ. बदेशा का नाम आया तो कहां से, ज्यूरी ने क्या देखकर उनके नाम को मंजूरी दी।
डॉ. बदेशा का कहना है कि उन्होंने सम्मान के लिए आवेदन ही नहीं किया है। पांच सदस्यीय चयन समिति के सदस्य डॉ. एसएन उपाध्याय ने इस पूरे मामले में कोई टिप्पणी करने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि इस बारे में डॉ. बदेशा कुछ बता पाएंगे।
सीएम की नाराजगी के बाद हो रहे खुलासों से लोग हैरान हैं। सम्मान के लिए गत 30 सितंबर तक नाम आमंत्रित किए गए थे। उपयुक्त व्यक्ति का चयन करने के लिए डॉ. बदेशा के नेतृत्व वाले आयुर्वेद चिकित्सा विभाग ने ज्यूरी के लिए 10 से ज्यादा नामों को भेजा था।
इसमें से पांच का चयन राज्य शासन से किया, जिसमें महाराष्ट्र के डॉ. केआर कोहली, उड़ीसा के डा. वीएन मिश्रा, बिलासपुर के आयुर्वेद चिकित्सा अधिकारी डॉ. प्रदीप शुक्ला, डॉ. एमटी टेकचंदानी, रायपुर के डॉ. एसएन उपाध्याय शामिल हैं। इसमें से डॉ. कोहली और डॉ. मिश्रा दोनों डॉ. बदेशा के साथ शिक्षा ली है। बिलासपुर के दोनों चिकित्सक उनके मातहत हैं। डॉ. उपाध्याय को दो साल पहले धनवंतरी पुरस्कार के लिए चुना गया था।
इस पुरस्कार से सम्मानित हो चुके महादेवप्रसाद पांडे का कहना है कि इस तरह के विवाद से पुरस्कार की विश्वसनीयता प्रभावित हुई है। अगर डॉ. बदेशा ने पुरस्कार के लिए खुद होकर अपना नाम भेजा है, तो यह गलत हुआ है।
बेवजह आ रहा नाम : डॉ. बदेशा का कहना है कि बेवजह उनका नाम विवाद में आ रहा है। उन्होंने इसके लिए आवेदन या दावा किया ही नहीं था। उन्होंने जो भी विभागीय काम किए अपनी नैतिक जिम्मेदारी के तहत किए हैं। कल पुरस्कार का लिफाफा खुलने तक उनको पता ही नहीं था कि वे दावेदारों की सूची में शामिल हैं।
पुरस्कार की शर्तो में यह बात शामिल है कि अगर चयनकर्ता चाहें तो सूची में शामिल दावेदारों के अलावा भी किसी ऐसे व्यक्ति का चयन कर सकते हैं, जिसने उनकी नजर में आयुर्वेद के विकास और प्रोत्साहन की दिशा में उल्लेखनीय काम किया है। अगर चयन समिति ने उनका नाम छांट लिया तो उसके लिए वह कहां से दोषी हैं। पुरस्कार के लिए विज्ञापन जारी करने के बाद से डायरेक्टर का रोल खत्म हो जाता है।