हम भट्ठी, तुम आग
नवनीत गुर्जर Tuesday, November 03, 2009 02:44 [IST]  

Fire त्वरित टिप्पणी. पांच दिन में जयपुर ने अच्छी तरह जान लिया है कि आईओसी टर्मिनल में लगी आग के दो ही पक्ष हैं। एक भट्ठी। दूसरा आग। भट्ठी जयपुर शहर है। ..और आग तो समर्थ है ही। जिसके सामने किसी का वश नहीं चला। न राज्य सरकार का। न आईओसी का। न केंद्र सरकार का। सबने हाथ खड़े कर दिए। कह दिया-हम कुछ नहीं कर सकते। आग तो खुद ही बुझेगी।



जिन उद्योगपतियों की फैक्ट्रियां तबाह हो गईं, वे आत्मदाह को उतारू हैं। इनमें काम करने वाले लोग, यहां रहने वाले नागरिक और आस-पास के ग्रामीणों की जिंदगी दूभर हो गई है। उनके सूरज की किरणों धुआं फांक रही हैं। साये पिंड छुड़ाकर भाग रहे हैं। उनके घर जैसे अपना ही पता पूछ रहे हों, बिस्तरों पर सन्नाटा पड़ा सो रहा है। उनका चांद पीपल का सूखा पत्ता, उनकी रातें सांय-सांय, जैसे अपने ही पहलू में बैठकर रो रही हों। ..और चेहरा जैसे चेहरा नहीं, उसका एहसास भर रह गया है।



मजाल है कोई सरकार, कोई विपक्ष या कोई अन्य जिम्मेदार जाकर अपने ही शहर में परदेशी हुए इन लोगों से बात भर कर ले, कि उनका दुख हल्का हो जाए! हां, बयानबाजी पूरी है-इतने दिन में सर्वे, इतने दिन में मुआवजा, इतने दिन की वसूली स्थगित। इतनी बड़ी तबाही, इतना बड़ा अपराध! फिर भी वसूली स्थगित। रद्द क्यों नहीं? बल्कि रद्द करने पर भी भरपाई तो नहीं ही होगी। जिंदा कौम के जिंदा रहनुमाओ, जरा पथराए गालों से आंसू तो पोंछो! भटकते लोगों को कोई जगह तो दो। सौ इस फैक्ट्री में पड़े आंसू बहा रहे हैं। दो सौ उस फुटपाथ पर सूनी आंखों से ऊपर देख रहे हैं। हालात यह हैं कि भूख चांद को चांद भी नहीं कहने देती। उसमें भी रोटी नजर आती है।



हैरत इस बात की है कि अकेले जयपुर ही नहीं, प्रदेश के सभी प्रमुख शहरों में ये तेल डिपो आबादी के बीच शान से खड़े हैं। कोई यह तक कहने को तैयार नहीं कि कितने समय में ये सभी डिपो शहर से दूर भेज दिए जाएंगे। हो सकता है पांच दिन की लाचारगी पर एक आंसू तक न बहाने वाली केंद्र और राज्य सरकार को जिस्मों की बजाय रूहों तक के जलने का इंतजार हो। गुलजार ने इन हालात पर लिखा है-



जिस्म सौ बार जले, तब भी वही मिट्टी का ढेला।

रूह इक बार जलेगी, तो वो कुंदन होगी।।

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