जोधपुर. दिल्ली में खूनी तवारीख की इबारत लिखने वाले क्रूर नादिरशाह के अफसाने पर सूर्यनगरी के रंगकर्मी दलपत परिहार और उसके साथियों ने सोमवार शाम इतना बढ़िया ड्रामा प्रस्तुत किया कि खचाखच भरा जयनारायण व्यास स्मृति भवन कह उठा वाह उस्तादों वाह..।
मुगलिया सल्तनत की रवायत और ईरान के शहंशाह की चमक जसे पीरियड ड्रामे को सीमित बजट व उससे भी कमतर साधनों से मंच पर हकीकत की तरह उतारने का कमाल इस तरह दिखाया कि अंतरराज्यीय ओम शिवपुरी नाटच्य समारोह के आयोजन में जोधपुर की धाक जमा दी।
नाटक के मूल कथानक में धन—दौलत की चाहत में नाम से शहंशाह व कर्म से लुटेरा नादिरशाह दिल्ली में कत्लेआम करवा देता है। वह दिल्ली से धन—दौलत के साथ साथ कोहीनूर हीरा व तख्तेताऊस भी ले जाता है। उसके कत्लेआम को रुकवाता है एक फकीर आकिब शाह जो शहंशाह को उसकी औकात बताता है।
सदमे से मरते हुए बूढ़े बाजीगर से वादा करने के बाद उसका बेटा जवान बाजीगर नादिरशाह के लख्तेजिगर को मार कर बदला लेता है। बेटे की मृत्यु का सदमा नादिरशाह की मलिका भी सहन नहीं कर सकी। उसे कत्लेआम में मारे गए लोगों की रूहें डराने लगती हैं। निर्देशक ने इस कत्ले आम तथा रूहों के नादिरशाह को डराने के दृश्यों में साइकेडेलिक लाइट का प्रयोग करते हुए कल्पनाशीलता का परिचय दिया।
उपयुक्त कास्टिंग व ड्रेसिंग : नाटक की कास्टिंग गजब की रही। निर्देशक ने नादिरशाह के पात्र के लिए डॉ. विजय धीर को चुना जो कद काठी व गेट अप से नादिरशाह जैसे लगे। हिंदुस्तान के शहंशाह के रूप में डॉ. एसजी रंगा न सिर्फ अपने पात्र को जीवंत कर सके वरन उर्दू संवादों की अदायगी भी उम्दा रही। लगभग सभी पात्रों की वेश भूषा के चयन में रचना भटनागर व डॉ. नीतू परिहार ने काफी समझदारी दिखाई।
वैसे नादिरशाह के आधुनिक जूतों की तरफ भी ध्यान दिया गया होता तो ठीक रहता। नाटक के अन्य पात्रों में फकीर आकिब शाह के पात्र में भरत वैष्णव ने सबसे अधिक प्रभावित किया। अन्य पात्रों में रमेश बोहरा, अजयसिंह, रामबाबू सोनी, बलबीरसिंह चौहान, मोहम्मद इमरान, संदीप गौड़, त्रिलोक गोस्वामी, छगनराज राव, मोहित, नरनारायण शर्मा, रितेश बोड़ा, निर्मलसिंह राजपुरोहित, लक्ष्मीकांत छैनू, सईदखान, जसवंत गर्ग, मनोहरसिंह चौहान व हिंमांशु ने भी अपने पात्र के साथ न्याय किया।
डायरेक्टर्स कट: नाटक के निर्देशक व सूर्यनगरी के वरिष्ठ रंगकर्मी दलपत परिहार के अनुसार इस धरती पर इन्सान फकीर या बादशाह जैसे कर्म करते हैं, उनको वैसा ही फल इसी जन्म में भुगतना पड़ता है। इसी थीम को लेकर परिहार ने अपनी लेखनी से कुछ हकीकत और कुछ खयाली किरदारों को लेकर ताना बाना बुना और तैयार हो गया नादिरशाह का ख़ाका। परिहार के अनुसार नाटक में सेट लगाने की भी सुविधा होती तो चार चांद लग जाते।
समापन आज होगा हास्य नाटक से राजस्थान संगीत नाटक अकादमी के तत्वावधान में आयोजित इस पांच दिवसीय नाटच्य समारोह का समापन मंगलवार को अभिनव रंगमंडल, उज्जन की प्रस्तुति हास्य नाटक मियां की जूती मियां के सिर के साथ होगा। नाटक के निर्देशक हैं शरद शर्मा।