इंदौर. हर तरफ एक ही चर्चा सुनाई दे रही है- चंपा भाग गई। चंपा बेकाबू हो गई। अच्छा हुआ उसने किसी को मारा नहीं। बेहतर होता अगर हम उसे घुमाते ही नहीं.. सभी ने अपनी-अपनी बात कह दी लेकिन कभी किसी ने मेरे दिल की बात जानने की कोशिश की है?
सालों से मैं और मोती इसी चहारदीवारी में जंजीरों और रस्सियों से बंधे हैं। मैं आपसे पूछती हूं, यदि आपको 23 घंटे बांधकर रखा जाए और 1 घंटा घुमाएं तो क्या आप संतुष्ट हो सकते हैं? इतना विशालकाय जानवर जो मस्त होकर घूमना पसंद करता है, झुंड में रहता है, उसे इतनी कम जगह में खड़े रहने पर मजबूर करना कहां का न्याय है?
जंगलों में मस्त होकर घूमने वाले हाथी के लिए सिर्फ दाएं-बाएं, आगे-पीछे होने की जगह रखी गई है। इतनी निर्दयता के बाद अगर मैं कभी नाराज होऊं तो उलटा मुझ पर इल्जाम लगाया जाता है। जब-जब मुझे घुमाने के लिए बाहर निकाला जाता है, दिल करता है सारे बंधन तोड़कर दूर चली जाऊं।
रविवार सुबह यह इच्छा तीव्र हो गई और मैं खुद पर काबू न पा सकी लेकिन भागकर जाती भी कहां। कीचड़ में फंस गई और अंतत: यही आ गई। कभी-कभी मैं सोचती हूं अपने उन साथियों के बारे में जो सड़कों पर निकलते हैं। उन्हें तो आप गणोशजी का रूप मानकर नमन करते हो।
फिर यहां मुझसे ऐसा बर्ताव क्यों? क्या आपको इतिहास की जानकारी है? यदि नहीं तो मैं बताती हूं। पुराने जमाने में राजा हाथी पर सवारी करते थे। हाथी को प्रशिक्षित किया जाता था ताकि जरूरत पड़ने पर वह राजा की रक्षा कर सके। कभी सोचा है आज ऐसा क्या हुआ कि रक्षा करने वाला हिंसक हो गया। यदि नहीं तो अब सोचो।