उज्जैन. अखिल भारतीय कालिदास समारोह के तहत सोमवार को कालिदास अकादमी में मीठे सुरों की धारा बही। श्रोताओं ने सरोद और शास्त्रीय गायन सुना। सारस्वत कार्यक्रमों की श्रृंखला में महाकवि कालिदास व्याख्यानमाला का प्रवाह दूसरे दिन भी जारी रहा।
५२वां कालिदास समारोह अपने चरम पर है। पांचवां दिन सरोद वादन और शास्त्रीय गायन के नाम समर्पित रहा। खैरागढ़ के जयदीप घोष ने सरोद वादन से श्रोताओं को मुग्ध किया। करीब एक घंटे तक लोग सरोद के जादू से बंधे रहे।
लखनऊ की श्रुति साडोलिकर ने शास्त्रीय गायन की तान छेड़ी। कालिदास जीवन की कलाओं को नई दृष्टि देने वाले महाकवि: महाकवि कालिदास व्याख्यानमाला के क्रम में सोमवार शाम वाराणसी के प्रो. राजेंद्रप्रसाद पांडेय ने कालिदास की कलादृष्टि से श्रोताओं को परिचित कराया।
उन्होंने कहा कालिदास जीवन की कलाओं को अभिनव दृष्टि से अभिव्यक्त करने वाले महाकवि हैं। मुद्रा और मुद्रण ने अनेक विडंबनाओं को जन्म दिया लेकिन कालिदास की कला आज भी शाश्वत है।
महाकवि ने वैयक्तिक और वैश्विक उद्देश्यों को प्रकाशित किया है। कला शरीर को नहीं, मन को पुष्ट करती है। कालिदास को जानने के लिए दीर्घकालीन साधना की जरूरत है। अध्यक्षता प्रो. रहसबिहारी द्विवेदी ने की। संचालन लक्ष्मीनारायण पांडेय ने किया।