जयपुर. आईओसी की ओर से इमरजेंसी रेस्पोंस प्लान (जनता को अग्निकांड के समय आपातकालीन निकासी व बचाव का अभ्यास) की पालना नहीं करने का नतीजा रहा कि डिपो टैंक धमाकों में 11 जानें चली गई और कई घायल हो गए।
आईओसी प्रशासन ने डिपो में साल दो साल में मॉक ड्रिल करा अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली। इस ड्रिल का भी हश्र यह हुआ कि हादसे के समय मौजूद कर्मचारी अधिकारी अलार्म सुन ही नहीं पाए या अलार्म बजा ही नहीं।
जबकि स्थानीय जनता को साल में एक या दो बार आग से आपातकालीन निकासी और बचाव का अभ्यास कानूनन जरूरी है। इसके लिए बाकायदा आईओसी की ओर से डिपो की स्थापना के समय सरकार को लिखित में दिया जाता है। स्थानीय प्रशासन को भी मॉक ड्रिल और आंतरिक सुरक्षा को लेकर एक दो बैठकों को बारे में ही पता है। पिछली मॉक ड्रिल एक साल से पहले कराई बताई जाती है।
हमारे पास तो एक से पहले आईओसी डिपो में आग का फोन आया था। उसी समय मॉक ड्रिल हुई थी। जनता को इमरजेंसी में आवास खाली कराने का याद नहीं।
- ईश्वरलाल जाट, मुख्य अग्निशमन अधिकारी
मॉक ड्रिल तो कराई थी। इन कम्पनियों की आंतरिक सुरक्षा को लेकर कुछ बैठकें भी हुईं। लेकिन जनता को आपातकाल में आवास खाली कराने के बारे में तो पिछला रिकॉर्ड देखने के बाद ही बता पाऊंगा।
- कुलदीप रांका, कलेक्टर
हम पिछले डेढ़ दशक से डिपो से डेढ़ किलोमीटर दूर रह रहे हैं। आज तक प्रशासन ने अग्निकांड से पहले कभी मकान खाली नहीं कराए।
- विजय शर्मा (68 वर्ष), सेक्टर 8, प्रतापनगर
कैसे काम करता है इमरजेंसी रेस्पोंस प्लान
पिछले 20 साल से कनाडा, मध्य एशिया और अमेरिका में रिफाइनरी सुरक्षा विशेषज्ञ के रूप में काम कर रहे हैं राजेन्द्र दहिया ने बताया कि डिपो प्रशासन और स्थानीय फायर ब्रिगेड द्वारा योजना बनाकर साल में दो बार स्थानीय जनता को डिपो की आपातकालीन आग से बचाव का अभ्यास कराना आवश्यक है। इसके लिए आस पास के मुख्य व्यक्ति चयनित किए जाते हैं। आग के समय सबसे पहले उन्हीं व्यक्तियों को सूचना दी जाती है।
लोगों को बताया जाता है कि डिपो में आग लगने पर कभी भी घर छोड़कर जाना पड़ सकता है। अग्निकांड या धमाके के समय आपातकाल में घर छोड़ने का तरीका, आग के समय घर से निकलने की दिशा, अफवाह से दूर रहने आदि का अभ्यास कराया जाता है। इसके साथ आंतरिक सुरक्षा के लिए मॉक ड्रिल भी कराई जाती है।