रायगढ़. जिले के लैलूंगा ब्लाक अंतर्गत ग्राम कुर्रा हरी भरी सुरम्य वादियों के बीच पहाड़ों से घिरा है। यहां की एक गुफा के संबंध में ग्रामीण कई तरह की रहस्यमयी बातें करते हैं। इसके संबंध में कहा जाता है कि यहां वनवास के समय पांडवों ने कुछ समय बिताया था। वहीं इसे लव-कुश की क्रीड़ा स्थली भी कहा जाता है।
पिछले 15 साल से कुर्रा गुफा में साधना में लीन अघोरी बाबा एकलक्ष्य का कहना है कि खुदाई के बाद गुफा में शेष नाग व भगवान विष्णु की भंग प्रतिमा मिली है। वहीं, यहां अनंत भगवान त्रिपुण्ड शंकर व काल भैरव की भी प्रतिमाओं के अवशेष मिले हैं। क्षेत्रीय लोगों का कहना है कि पूर्व काल में यह गुफा भूतों का घर हुआ करता था।
नाग लोक के प्रवेश का द्वारा भी इस गुफा को माना जाता है। महर्षि वाल्मिकी के तपोभूमि के रूप में क्षेत्र के बुजुर्ग इस गुफा को जानते हैं, जहां इन दिनों देवलोक की नहीं बल्कि मरघट में किए जाने वाले अघोर पूजा की जाती है। लव-कुश के क्रीड़ा स्थल व वाल्मिकी के तपोस्थल के नाम से क्षेत्र में प्रसिद्धि पा चुकी इस गुफा को लोग पर्यटन स्थल के रूप में मानते हैं, और काफी संख्या में यहां साल के हर मौसम में लोगों का आना होता है।
गांव के80 वर्षीय बहादुर भोई ने बताया कि उन्होंने तो गुफा के अंदर प्रवेश नहीं किया है लेकिन उनके पूर्वजों से मिली जानकारी के अनुसार यह गुफा करीब 80 मीटर तक 6 फीट ऊंचाई पर है इसके बाद धीरे-धीरे गुफा का आकार सकरा होता गया है। इस प्राकृतिक गुफा में 100 मीटर की दूरी तय करने के बाद तीन धाराओं का संगम है जिसे गंगा-जमुना व सरस्वती का रूप माना जाता है। त्रिधारा के संगम के साथ ही यहां तीन दिशाओं पर अलग-अलग रास्ते भी बने हुए हैं।
जिनमें से एक रास्ता आगे जाकर दलदल में तब्दील हो जाता है। वहीं दूसरा रास्ता एक विशाल तालाब में जाकर खत्म होता है। तीसरे रास्ते पर पुरातन मंदिर के क्षत-विक्षत अवशेष होने की जानकारी मिली है। कुछ ऐसा ही कहना है गांव के 75 वर्षीय समारु प्रधान का। उनके बुजुर्गो ने गुफा से जुड़ी किवदंतियों के संबंध में उन्हें बताया था कि यहां कहीं सुरंग है तो कहीं मैदान। पंच पाण्डव व देवी देवताओं की मूर्ति है।
पानी से भरे तालाब के बाद कहीं कुछ दिखाई नहीं देता। गांव के 80 वर्षीय चमरा राम राठिया ने भी इस गुफा के रहस्यमयी होने की बात कहते हुए बताया कि पत्थरों की मुर्तियां विखंडित होकर गुफा के अंदर में पाई गई है। हमारे बुजुर्गो ने बताया था इस गुफा के रहस्यों को सामने लाने के लिए कई लोग अंदर गए।
कुछ तो डर के मारे आधे रास्ते से बाहर आ गए और जो हिम्मत कर भीतर गए वे जीवित वापस नहीं लौटे हैं। पूर्व में गांव के बड़े बुढ़ों को वे नाम भी याद थे जो कि इस रहस्यमय गुफा के भीतर जाकर गायब हो गए हैं। विकास की जरूरत है - 15 वर्षो से साधना कर रहे अघोरी बाबा का कहना है कि वे यहां गुरू-शिष्य परंपरा के तहत गुरूकुल की स्थापना करना चाहते हैं। गुरूकुल में रहकर छात्रों को इस पद्धति के गुढ़ रहस्यों से जोड़ना उनका मकसद है। लेकिन अभाव के कारण यह सब कुछ संभव नहीं हो पा रहा है।
लिया था गोद-छत्तीसगढ़ शासन के पर्यटन विकास विभाग ने 2006 में कुर्रा गुफा को जिले के पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने के लिए गोद लिया था। इसको तीन वर्ष बीतने के बाद भी आज तक विकास के नाम पर एक ईंट भी नहीं रखी गई है। जिस कारण यहां आने वाले पर्यटकों को पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिल पा रही है। गांव के पूर्व सरपंच रमेश राठिया बताते हैं कि रायगढ़-सरगुजा विकास प्राधिकरण के तहत यहां 6 लाख रूपए स्वीकृत हुए थे, लेकिन कार्य के नाम पर कुछ नहीं हुआ। केवल गुफा के बाहर कुछ सीढ़ियां ही बनाई गई है। वहीं, एक सामुदायिक भवन का भी निर्माण किया गया है जो कि अधूरा पड़ा हुआ है।