हिसार. शहर में एक ऐसा परिवार रहता है जो पिछले चौदह सालों से डस्टबिन का इस्तेमाल नहीं करता। ऐसा नहीं है कि डस्टबिन का प्रयोग नहीं करने के कारण उनके घर में कचरा भर गया होगा। उनका घर पूरी तरह से साफ-सुथरा है।
क्या है मामला
चौंकिये मत, यह सच है। ये परिवार बस घर के गलनशील कचरे को बाहर के कूड़ेदान में नहीं जाने देते और इस कूड़े से हर साल तैयार करते हैं 800 किलो कंपोस्ट खाद। यह अनोखी मिसाल कायम की है हकृवि के सेवानिवृत्त शिक्षक सतीश कालरा और गवर्नमेंट कॉलेज की शिक्षिका व उनकी पत्नी सुदेश कालरा ने।
खाद तैयार करने की सूझी
1995 में ग्रीन डेवलपमेंट पूना के धावोलकर और अपने एक सहकर्मी के कहने पर हकृवि में माइक्रोबायोलॉजी विभाग से जुड़े शिक्षक सतीश कालरा को केचुए से कंपोस्ट खाद तैयार करने की सूझी। जेएनयू के एक सहयोगी से केचुए मंगाए और अर्बन स्टेट दो स्थित अपने निवास पर डेढ़ गुणा डेढ़ फुट का गढ्ढा खोदकर मिट्टी के अंदर उन केचुओं को डाल दिया।
बाद में तीन गुणा चार फिट की लंबाई-चौड़ाई और ढाई फुट गहराई तक के दो पिट और बनाए। इसमें उन्होंने मिट्टी के साथ केचुए डाल दिए और ऊपर से घर का गलनशील कचरा डालने लगे।
पिट में प्रतिदिन एक बार पानी
इसके बाद से उनके घर में केचुओं से कंपोस्ट खाद बनाने का सिलसिला शुरू हो गया। अब उनके घर में डस्टबिन की जरूरत नहीं रही। सतीश कालरा बताते हैं कि उन्हें पिट में प्रतिदिन एक बार ही पानी डालना होता है। पिट में उन्हें जलनिकासी की व्यवस्था भी बनाए रखनी पड़ती है।
घर की सब्जियों के छिलके, अंडों व फलों के छिलकों सहित हर तरह का गलनशील क चरा पिट में डाला जा सकता है। एक साल में इन पिट से चार बार खाद तैयार हो जाती है। कालरा दंपत्ति ने जब पूरी रूचि से इस काम को करना जारी रखा तो हर वर्ष तकरीबन 800 किलोग्राम तक कंपोस्ट खाद तैयार होने लगी। कालरा परिवार के पास एक छोटा सा गार्डन है, जिसमें एलोविरा, गिलो, नीम, अमलतास, करौंदा सहित कई प्रकार के फल-फूल के पौधे हैं।
आधी खाद मित्रों में बांटते हैं
तैयार कंपोस्ट का आधा इस्तेमाल तो उनके खुद के गार्डन में हो जाता है और बाकी मित्रों में बांट देते हैं। दोनों दंपत्ति सार्वजनिक स्थानों पर इस पद्धति से कंपोस्ट खाद तैयार करने के लिए लोगों को प्रेरित करते हैं।
सतीश कालरा की पत्नी व पेशे से अर्थशास्त्र की शिक्षिका सुदेश कालरा अपनी छात्राओं को भी इस तरह के पिट के जरिए कंपोस्ट खाद तैयार करने की सलाह देती हैं। सुदेश ने बताया कि उनके घर का केवल वही कचरा बाहर जाता है जो गल नहीं सकता।
उन्हें पिछले चौदह सालों से डस्टबिन की जरूरत नहीं पड़ी है। इस पद्धति से वह न केवल कचरे का सदुपयोग करते हैं, बल्कि काफी गुणवत्ता वाली खाद भी प्राप्त करते हैं। इससे उन्हें काफी फायदा होता है।