पंडित विष्णु शर्मा ने पंचतंत्र के सारे पात्रों को कंवारा ही रहने दिया। बरसों तक वे सब के सब एक कहानी से दूसरी कहानी में कंवारे ही घूमते रहे। इससे जंगल की जिंदगी बहुत बोरियत भरी हो गई।
एक दिन मंत्री करकट ने महाराज पिंगलक को सुझाव दिया कि पंचतंत्र के सारे पात्र बहुत ही बोरियत से भरी हुई जिंदगी जी रहे हैं। इससे तो अच्छा है कि हम सब शादियां कर लें। जीवन में कुछ तो रौनक होगी। दमनक और संजीवक ने करकट के सुझाव का समर्थन किया। पिंगलक को भी बात जंच गई। वह स्वयं भी बरसों से इस पेड़ के नीचे अकेला सोता हुआ बोर हो गया था।
सो बात तय हो गई और प्रोटोकॉल के अनुसार सबसे पहले महाराज पिंगलक की ही शादी हुई। बड़ी धूमधाम मची। दीर्घमुख, हिरण्यक और लघुपतनक आदि पशु-पक्षी बैंड-बाजे की धुन पर खूब नाचे। दावत में खरगोशों के लिए गाजरों से लेकर चूहों के लिए अनाज के दाने और राजहंसों के लिए दूध परोसा गया। लोमड़ियों, गीदड़ों, बगुलों और कछुओं के लिए भी मनपसंद व्यंजन परोसे गए। वेदमंत्रों से जंगल गूंज उठा।
पशु-पक्षियों को आनंद आ गया। इसके बाद तो जंगल में शादियों की झड़ी लग गई। संजीवक, करकट, दमनक, हिरण्यक, चित्रवर्ण, मेघवर्ण सबकी शादियां हो गईं। अब केवल लघुपतनक ही बचा था जिसने विवाह करने से मना कर दिया। एक दिन करकट की नवोढ़ा पत्नी करकटी बोली-‘स्वामी! लघुपतनक का विवाह भी करवाइए!’
करकट उस समय दरबार जाने की तैयारी कर रहा था। वह बोला-‘लघुपतनक ने विवाह करने से इनकार कर दिया है।’
‘आप प्रयास तो कीजिए।’ करकटी ने करकट के गले की टाई सीधी करते हुए कहा।
‘जब वह विवाह करना ही नहीं चाहता तो जबर्दस्ती क्यों करें? वह तो शुरू से ही साधु स्वभाव का है।’
‘लेकिन आपको उसका विवाह तो करवाना ही होगा।’ करकटी ने जिद पकड़ ली।’
‘लेकिन क्यों?’
‘आप स्वयं तो कुछ समझते नहीं हैं, जैसा मैं कहती हूं वैसा करो तो सही डार्लिग।’
‘पता भी तो चले आखिर क्यों?’
‘स्वामी! इस जंगल में अब तक सबसे अंत में अपना विवाह हुआ था। हमारे विवाह में सारे जानवरों की पत्नियां महंगी साड़ियां, व्हाइट गोल्ड की अंगूठियां और बीस-बीस लाख के हीरों के हार पहनकर आई थीं। अपनी ज्वेलरी दिखाने के लिए उन्होंने तो भर सर्दी में लो नेक तथा डीप कट बैक ब्लाउज पहने थे और रात भर सर्दी में सिकुड़ी थीं।
मेरी मम्मी ने भी मुझे कीमती साड़ियां और ज्वेलरी दी है। मैं कैसे सबको दिखाऊं? जब लघुपतनक की शादी होगी, तभी तो मैं अपनी साड़ियां और ज्वेलरी पहनकर सबको दिखा सकूंगी। इसलिए आपको लघुपतनक का विवाह करवाना ही होगा। आपको मेरी कसम। करवाओगे न! हाय! मैं किसी की शादी में कब जाऊंगी!’ इतना कहने के पश्चात एक लंबी सांस भरकर करकटी उदास होकर एक ओर को बैठ गई।
करकटी की उदासी देखकर करकट भी उदास हो गया। उसके पास हां करने के अतिरिक्त चारा भी क्या था!