विश्व अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत काफी पहले से मिलने लगे थे, लेकिन हाल ही में अमेरिकी वाणिज्य विभाग के आंकड़े इस बात की तस्दीक करने के लिए पर्याप्त होने चाहिए कि वैश्विक अर्थव्यवस्था सबसे बुरे दौर से उबरने लगी है। इन आंकड़ों के अनुसार जुलाई से सितंबर के बीच अमेरिकी अर्थव्यवस्था में साढ़े तीन फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। यह न केवल पिछले 80 साल में सबसे बड़े आर्थिक संकट से जूझ रहे अमेरिका के लिए, बल्कि सारी दुनिया के लिए भी अच्छी खबर है।
मौजूदा वैश्विक आर्थिक संकट की शुरुआत अमेरिका से हुई थी और इसलिए इसके खात्मे के लिए अमेरिका से ही अच्छी खबर के आने का इंतजार लंबे अर्से से किया जा रहा था। ओबामा के 787 अरब डॉलर के राहत पैकेज की बदौलत अमेरिका के बुनियादी क्षेत्र के प्रदर्शन में सुधार हुआ है। इस बीच दुनिया की कई अर्थव्यवस्थाएं मंदी से बाहर आने की घोषणाएं कर चुकी हैं। मार्च २क्क्९ से विश्व के कई शेयर बाजारों में भी उत्तरोत्तर सुधार नजर आया है। भले ही आज आर्थिक संकट की समाप्ति को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हुआ जा सकता, लेकिन इन हालात में अमेरिकी वाणिज्य विभाग के आंकड़ों को एक अच्छा शगुन तो माना ही जा सकता है।
भारत में आर्थिक सुस्ती का सबसे ज्यादा असर सितंबर २क्क्८ से फरवरी २क्क्९ के बीच था, लेकिन इसके बाद से अर्थव्यवस्था में सुधार आया है। यहां मुख्य समस्या स्थिरता को लेकर है। शेयर बाजार में जान आई है, लेकिन बीच-बीच में लगते झटकों की वजह से निवेशकों का भरोसा अब भी पुराने ट्रैक पर नहीं लौटा है। इसी तरह देश के बुनियादी क्षेत्र में भी विकास दर अस्थिर बनी हुई है। अगस्त में जहां इसने 7.8 फीसदी की दर से विकास करके उम्मीद जगाई तो वहीं सितंबर में यह 4 फीसदी तक गिर गया।
तमाम अच्छे शगुनों के बावजूद अभी यह मानना जल्दबाजी होगी कि दुनिया को वैश्विक आर्थिक संकट से तुरंत मुक्ति मिल जाएगी। अमेरिका में बेरोजगारी की दर 9.8 फीसदी हो गई है जो पिछले २६ सालों में सबसे ज्यादा है। इसी तरह भारत में नए रोजगारों का सृजन महत्वपूर्ण होगा। मुद्रास्फीति की दर को थामना भी एक बड़ी चुनौती हो सकती है, जिसने अब नकारात्मक ट्रेंड से निकलकर ऊपर की ओर जाना शुरू कर दिया है। इस मायने में २क्१क् सबसे अहम साबित होगा जो विकास की नई गाथा लिख सकता है।