दुनिया का 30 प्रतिशत थोरियम भारत में पाया जाता है और आने वाले वर्षो में इसका उपयोग एनर्जी निर्माण के अलावा मेडिकल साइंस और दूसरी नॉन—डिस्ट्रक्टिव टैक्नोलॉजीज के क्षेत्र में भी बढ़ेगा, ये विचार भाभा अटॉमिक रिसर्च सेंटर के न्यूक्लियर डाटा सैक्शन के हैड प्रो. एस. गणोशन ने मंगलवार से राजस्थान यूनिवर्सिटी में शुरू हुई तीसरी थीम मीटिंग में रखे। यह मीटिंग डिपार्टमेंट ऑफ अटॉमिक एनर्जी और बोर्ड ऑफ रिसर्च इन न्यूक्लियर साइंसेज की ओर से आयोजित की जा रही है। इसका उद्देश्य देशभर में हो रही न्यूक्लियर रिसर्च को कॉर्डिनेट कर उनका डाटा बैंक तैयार करना है।
न्यूक्लियर रिसर्च के फील्ड में काफी नाम कमा चुके प्रो. गणोशन ने बताया कि थोरियम का यूज करने के लिए यूरेनियम की जरूरत पड़ती है, जो कि भारत में तुलनात्मक रूप से काफी कम है। अब उपलब्ध थोरियम का यूज बढ़ाने के लिए भारत ने अपने स्तर पर कई टैक्नोलॉजी डवलप की हैं। इनमें यूरेनियम की जरूरत नहीं होती।
ऐसी ही एक टैक्नोलॉजी स्पैलेशन फॉर्मेट है। भारत ने ऐसी कई टैक्नोलॉजी डवलप की गई हैं। इसी क्रम में केरल में बने रिएक्टर ‘कामनी’ को पूरी दुनिया ने एक बैंचमार्क माना गया है। भारत 2008 से इंटरनेशनल न्यूक्लियर रिएक्शन डाटा सेंटर नेटवर्क का एक्टिव मैम्बर है। ऐसे ही बैंचमार्क प्रोजेक्ट्स से जुटाए डाटा दूसरे देशों को उपलब्ध करवा कर उनके डाटा हासिल किए जा रहे हैं।