शिमला. हिमाचल के कृषि और बागवानी उत्पादों को अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलेगी। यह पहचान भारत में पहली बार जैविक उत्पादों पर हो रहे अंतरराष्ट्रीय मेले में प्रदेश के किसान और बागवान दिलाएंगे।
वायोफेग इंडिया और जर्मनी की संस्था इंटरनेशनल फेडरेशन ऑन ऑर्गेनिक एग्रीकल्चर मूवमेंट (आईपॉम) के संयुक्त तत्वावधान में महाराष्ट्र के गोरेगांव में 18 से 20 नवंबर को लगने वाले अंतरराष्ट्रीय जैविक कृषि मेले में प्रदेश के 25 किसानों और बागवानों का चयन हुआ है। मेले में फ्रांस, जर्मनी, चीन और अमेरिका के किसान व बागवान भी अपने उत्पादों की प्रदर्शनी लगाएंगे।
रामपुर की शीला चौहान अखरोट के अलावा पारंपरिक अनाज कोदा और कावनी को लेकर मेले में जा रही हैं। किन्नौर के चांगों गांव की बिमला नेगी ड्राई फ्रूट और मेवे, लाहौल—स्पीति के छेरिंग ड्राई फ्रूट और सेब तथा करसोग के राजेश ठाकुर जैविक विधि से तैयार सेब लेकर जा रहे हैं। मेले में कृषि—बागवानी उत्पादों सेब, फल, सब्जियां, सूखे मेवे, दालों और पारंपरिक अनाजों सहित कुल 47 जैविक उत्पादों की प्रदर्शनी लगेगी। वहां इनकी बिक्री भी होगी।
मेले में बेहतर जैविक उत्पादों की प्रदर्शनी लगाने वाले किसानों और बागवानों का चयन विदेशों में आयोजित होने समारोहों के लिए किया जाएगा। मेले के बाद किसान व बागवान पूना की जैविक कृषि संस्थाओं का दौरा करेंगे। जैविक उत्पादों की जानकारी लेने के बाद वे मुंबई की सहकारी संस्थाओं की कार्यप्रणाली से भी अवगत होंगे।
स्वयं सेवी संस्था हिर्मोड के चेयरमैन डॉ. आरएस मिन्हास के अनुसार किसान और बागवान पैदावार के लिए रासायनिक खादों को छोड़ ऑर्गेनिक खाद का इस्तेमाल करने लगे हैं। जैविक खेती से उत्पादों की गुणवत्ता बढ़ती है, साथ ही मार्केट में बेहतर दाम मिल रहे हैं। डॉ. मिन्हास ने बताया कि जैविक खेती को प्रोत्साहित करने के लिए संस्था किसानों और बागवानों को अपने स्तर पर जैविक उत्पाद उपलब्ध करवा रही है।