चंडीगढ़. केंद्र सरकार की राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना (नरेगा) का रंग पंजाब में फीका ही रहा है। प्रदेश में प्राइवेट तौर पर दिहाड़ी नरेगा से कहीं अधिक होने के कारण लोग इस स्कीम के तहत काम करने में रूचि नहीं दिखा रहे। इस पर राज्य सरकार की बेरूखी भी योजना की सफलता में बड़ी बाधा बनती दिख रही है। राज्य सरकार ने इस योजना के लिए आवश्यक दस फीसदी राशि में एक फूटी कौड़ी भी जारी नहीं की।
पंजाब में नरेगा के अधीन दिहाड़ी 123 रुपए दी जा रही है हालांकि राष्ट्रीय तौर पर अभी केवल 90 रुपए ही अदा करने के ही आदेश हैं चूंकि राज्य सरकार ने न्यूनतम वेज 123 रुपए देने की अधिसूचना जारी कर दी इसलिए पंजाब,आंध्र-प्रदेश और त्रिपुरा जैसे राज्य अपने राज्यो में दी जा रही न्यूनतम वेज के हिसाब से ही पैसे दे रहे हैं। बताया जाता है कि कंेद्रीय रोजगार गारंटी काउंसिल ने इस संबंधी अभी फैसला लेना है। आंध्र-प्रदेश ने तो इसके लिए हाईकोर्ट में याचिका भी दायर कर रखी है जिसमें कहा गया है कि वह अपने राज्य में अधिसूचित न्यूनतम वेज से कम नहीं दे सकते।
नरेगा के पंजाब में सफल न रहने के कुछ सामाजिक कारण भी हैं। मसलन जब राज्य में निर्माण और कृषि क्षेत्र की दिहाड़ी 150 से 200 रुपए के बीच है ऐसे में कोई भी मजदूर 123 रुपए पर काम करने के लिए इच्छुक नहीं हो रहा। इसके अलावा पंजाब में गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों की संख्या भी काफी कम है। ग्रामीण क्षेत्र में यह मात्र 3.42 लाख है जबकि इतनी तो उत्तर प्रदेश के मात्र एक बाराबंकी जिले की बनती है।
जालंधर सबसे पिछड़ा
बेशक अनुसूचित जाति के लोगों की सबसे अधिक संख्या दोआबा में है लेकिन नरेगा को लागू करने में जालंधर पंजाब का सबसे पिछड़ा क्षेत्र है जबकि अमृतसर पहले नंबर पर चल रहा है। जहां ज्यादातर जिले इस योजना में दूसरी किश्त भी लेने जा रहे हैं वहीं जालंधर की अभी पहली किश्त में जारी राशि भी खर्च नहीं हुई है। पिछले साल का 41.56 करोड़ मिलाकर विभाग के पास इस समय 80.63 करोड़ रुपए हैं, जिसमें से 52 करोड़ खर्च हो चुके हैं।
खास बात यह है कि यह सारी राशि केंद्र सरकार की है इसमें राज्य सरकार ने अपनी ओर से फूटी कौड़ी जारी नहीं की है। विभागीय सूत्रों का कहना है कि यदि राज्य सरकार ने अपना हिस्सा न दिया तो केंद्र इस साल की दूसरी किश्त जारी करने में आनाकानी कर सकता है।