चंडीगढ़. मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा और भजनलाल के बीच चल रही ‘मूंछ’ की लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। मंत्रिमंडल गठन भी इसी वजह से नहीं हो पा रहा। दोनों नेताओं के बीच वर्ष 2005 में शुरू हुई इस लड़ाई में इस मर्तबा कई नेताओं की कुर्सी छीनना तय है।
दरअसल इस खेल में हजकां की तरफ से रेफरी भजनलाल हैं और कप्तानी कुलदीप बिश्नोई ने संभाल रखी है। भजनलाल के खेल कोहुड्डा भी दूर तक देख रहे हैं, यही वजह है कि वह केवल सरकार चलाने तक सीमित नहीं रहना चाहते। हुड्डा के लिए भजनलाल की शर्त मानने का मतलब है अपनी ही पार्टी में पांचवां बड़ा विरोधी नेता तैयार करना।
केवल छह सीटों वाली हजकां के नखरे यूं ही सातवें आसमान पर नहीं हैं। इस मुहिम में घर के भेदी ही लंका ढहा रहे हैं। जिन नेताओं की हुड्डा के 2005 में मुख्यमंत्री बनने और 2009 में दोबारा ताजपोशी तक सोनिया दरबार में नहीं चली, उन्होंने अब बंदूक दूसरे कंधों पर रख दी है।
राजनीतिक पंडितों के अनुसार, कुलदीप बिश्नोई कांग्रेस में अपना कट्टर विरोधी हुड्डा को ही मानते हैं क्योंकि पिछली बार भजनलाल की कुर्सी उन्होंने ही छीनी थी। इसी वजह से उन्होंने चुनाव परिणाम आते ही कांग्रेस को समर्थन देने के बदले हुड्डा को मुख्यमंत्री नहीं बनाने की शर्त रख दी। हालांकि कुछ कांग्रेसी नेताओं के संपर्क में आते ही वह इस शर्त को भूल गए।
चुनाव परिणाम के बाद भजनलाल ने भी दिल्ली के गलियारों में कई दिन बिताए और सबकुछ भांपकर गेम बदलवा दिया। अब कुलदीप कहने लगे कि वह पद के लालची नहीं हैं, उनकी शर्त तो सिर्फ हजकां के घोषणा-पत्र को पूरा करने की है। विश्वास मत के दौरान विधानसभा से अनुपस्थित रह कर उन्होंने फिर नए समीकरणों को जन्म दिया।
हजकां सूत्र बताते हैं कि देर-सवेर हजकां सरकार में शामिल होगी। बाद में उसका विलय भी संभव है। कारण, भजनलाल व कुलदीप कांग्रेस में फिर से पैर जमाना चाहते हैं। हजकां की हालत वह दो चुनाव में देख चुके हैं। पार्टी कार्यकर्ता भी कांग्रेस को समर्थन देने का दबाव बना रहे हैं। भजनलाल गुट की नजर सरकार में पूरा प्रभाव जमाने की है ताकि प्रदेश में उनके पुराने समर्थक फिर से ताल ठोंक सकें। अपने क्षेत्र में मजबूत होकर हुड्डा के समानांतर चलने की सोच भी उनकी हो सकती है।
हुड्डा भी कम नहीं
हुड्डा भी हालात का आकलन कर चुके हैं और इसी वजह से वह हजकां को भाव नहीं दे रहे। वह शुरू से कह रहे हैं कि हजकां बिना शर्त समर्थन दे या कांग्रेस में शामिल हो तो स्वागत है। भजन कांग्रेस में अपने संपर्को को खंगाल चुके हैं लेकिन हुड्डा ने सोनिया दरबार को विश्वास में ले रखा है।