बचपन में की गई शरारतें खट्टी—मीठी यादें बन इंसान के साथ हमेशा रहती हैं। ऐसी ही यादों में बसे बचपन को मैंने कैनवस पर रंगों और रूपाकारों से जीवंत करने की कोशिश ही है। ये कहना है गुजरात से आए युवा आर्टिस्ट शैलेश राठौड़ का। इन दिनों इनकी पेंटिंग एग्जीबिशन जेकेके की पारिजात आर्ट गैलेरी में चल रही है। राठौड़ ने एंजॉय नाम से लागाई एग्जीबिशन की थीम बचपन की मस्ती रखी है।
एग्जीबिशन में एक्रेलिक रंगों से सजी कुल 30 पेंटिंग्स एग्जीबिट की गई हैं। सभी पेंटिंग्स इतनी कुशलता से बनाई गई हैं कि देखने वाला पलभर में अपने बचपन में की गई शरारतों की यादों में खो जाता है। इसी वजह से शैलेश की पेंटिंग्स विजिटर्स को बरबस ही आकर्षित कर लेती हैं। पेंटिंग्स में ग्रामीण परिवेश की प्रधानता है। सभी पेंटिंग्स में आधुनिक जीवन की झलक है तो रियलिस्टिक और क्रियेटिव वर्क का बेहतरीन समन्वय भी है। एग्जीबिशन का आयोजन गुजरात ललित कला अकादमी के सहयोग से किया गया है।
बचपन की शैतानियां नहीं नादानियां
बचपन की मस्ती थीम पर शैलेश कहते हैं, बचपन की मासूम शौतानियां सभी का जीवन का अनमोल हिस्सा होती हैं। अमतौर पर बचपन की शौतानियां सभी एक जैसी करते हैं। बड़े होने पर यही शौतानियां याद आने पर सभी को हंसने—हंसाने का मौका देती है, यहां तक कि कई बार तो अपने आप पर ही हंसी आ जाती है। सच कहूं तो इन्हें शैतानियां नहीं नादानियां कहना चाहिए।
क्योंकि बच्चों को पता ही नहीं होता कि वे जो कर रहे हैं उससे उन्हें भी परेशानी हो सकती है। मैंने भी ऐसी खूब नादानियां की है। खिड़की से अपने दोस्तों के साथ बंदर को अजीबो—गरीब मुद्राएं बनाकर चिड़ाना, साइकिल पर बैठ कर हैंडिल को बिना पकड़े चलाना। ऐसा करने से मैं कई बार गिरा भी और चोट भी लगी। मधुमक्खी के छत्ते में पत्थर मारना और फिर बचने के लिए इधर उधर भागना। ऐसी ही यादों को मैंने पेंटिंग्स में उतारा है।
गांव में असली इंडियन कल्चर
ग्रामीण परिवेश पर बनाई पेंटिंग्स के बारे में शैलेश कहते हैं, गांव में ही असली इंडियन कल्चर देखने को मिलता है। प्रकृति की खूबसूरती के साथ ग्रामीणों के दैनिक कार्यो को मैंने उकेरा है। गुजराती परिवेश में खेतों पर काम करती या गली गली घूम कर सामान बेचती महिलाओं जैसे सब्जेट्स पर मैंने पेटिंग्स बनाई हैं। इसमें मेरी कोशिश रही है कि सभी ज्यादा से ज्यादा रियलिस्टिक रहें।