City Bhaskar Jodhpur
‘मियां की जूती मियां के सिर’ ने किया निराश
भास्कर न्यूज Wednesday, November 04, 2009 04:09 [IST]  

जोधपुर. महिलाओं के मान सम्मान के लिए ऐड़ी से चोटी का जोर लगा रहे समाज के सामने किसी शादीशुदा औरत इस तरह खुले आम चरित्र चित्रण तथा महिलाओं को संबोधित करते हुए नाटक के चरित्रों द्वारा अपशब्दों का उपयोग करते हुए रचे गए नाटक को हास्य नाटक तो हरगिज नहीं कहा जा सकता।

ओम शिवपुरी की स्मृति में आयोजित नाटच्य समारोह का समापन मंचन मंगलवार को उज्जैन के अभिनव रंगमंडल की ऐसी फूहड़ प्रस्तुति से हुआ कि लोगों को एक दिन पहले का नादिरशाह की क्रूरता नाटक की शानदार प्रस्तुति बरबस ही याद हो आई। जयनारायण व्यास स्मृति भवन में मंगलवार को सपरिवार बैठे दर्शक ठगे से रह गए।

राजस्थान संगीत नाटक अकादमी के तत्वावधान में आयोजित इस समारोह के 18 वर्ष के इतिहास में अब तक के सबसे कम अवधि 55 मिनट के नाटक मियां की जूती मियां के सिर का मूल कथानक निर्देशक शरद शर्मा ने सोलहवीं शताब्दी में मौलियर का रचा हुआ बताया।

लेकिन निर्देशक शर्मा अपने नाटक में तब की प्रसिद्ध नाटच्य शैली कॉमोदियादे आर्ते के तत्वों का समावेश बताकर अपने आप को भारतीय समाज में शौहर से छल कपट करते हुए पराए मर्द के साथ खुलमखुल्ला प्रेम की पींगें बढ़ाने वाली स्त्री दिलजान के बेवफा पात्र को महिमा मंडित करने से नहीं बच सके।

बेतुका अभिनय, बेजा हरकतें

नाटक में मिर्जा बरबाद कुरैशी के पात्र भले ही अपने को श्रेष्ठ समझते रहे, लेकिन उनके द्वारा बोले गए अपशब्द सूर्यनगरी के सुधि दर्शकों व उनके परिवारों को आहत करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। नाटक में स्त्री पात्र का निर्वाह कर रहीं कलाकार शायद सिर्फ इसलिए खड़ी की गई कि नाटक में स्त्री पात्रों की जरूरत थी, अन्यथा न ही उन्हें डायलॉग डिलीवरी आई और न ही उन्हें यह पता था कि अभिनय किसे कहते हैं।

स्त्री पात्रों की ओर इशारे करना बेजा हरकत ही कही जाएगी। साथ में एकाध पात्र ने तो सर्कस के जोकर की तरह कुलांचे मारते हुए अभिनय जैसा कुछ करने का प्रयास किया।

वहीं हो गई आलोचना

अकादमी के पूर्व अध्यक्ष मदनमोहन माथुर का कहना था कि मौलियर जरूर सोलहवीं शताब्दी में असरदार रहे होंगे, उनके दर्शकों का वर्ग भी अलग तरह का रहा होगा, लेकिन नाटक को भारतीय परिवेश में ढालते समय कम से कम सामाजिक वर्जनाओं को ध्यान में रखना ही चाहिए। वरिष्ठ रंगकर्मी गीता भट्टाचार्य का कहना था कि ऐसा नाटक करने व करवाने वाले जाने।

कुछ रंगकर्मियों को यह कहते सुना गया कि फिल्मों की तरह नाटकों को भी पहले सेंसर करना जरूरी होना चाहिए। नाटक के बारे में दर्शकों व हॉल में मौजूद रंगकर्मियों से इतना कुछ सुनने के बाद डायरेक्टर्स कट के लिए नाटक के निर्देशक से भी बात करने की इच्छा नहीं हुई।

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