जनता केवल संख्या नहीं हैं:सुनील सुकथानकर
Rajesh Yadav Wednesday, November 04, 2009 13:42 [IST]  

Sunil मुंबई. दोगही, जिंदगी जिंदाबाद जैसी फिल्म के निर्देशक सुनील सुकथांकर (सुमित्रा भावे के साथ सहनिर्देशक)मराठी फिल्म एक कप चाय को मंगलवार को मुंबई फिल्म महोत्सव में दिखाया गया है। फिल्म को दर्शको ने बेहद पसंद किया है , इसी अवसर पर निर्देशक सुनील संथानम ने हमसें बात की :



एक कप चाय ही क्यों ?



एक सामान्य आदमी कुछ लोगों की भूल के कारण किस तरह से परेशान हो जाता है और कैसे फिर वह अपनी समस्या का हल करता है इस बात को दिखाने का प्रयास किया है। एक कप चाय के माध्यम से हम बताना चाहते है कि जनता केवल संख्या नहीं, हर एक का अपना व्यक्तित्व और आत्म सम्मान है और एक लोकतांत्रिक समाज में इससे खेलने का हक किसी को नहीं है।



फिल्म में काशीनाथ सावंत का परिवार का संघर्ष और वर्तमान जनचेतना को आप कैसे देखते है?



हर आदमी अपनी लड़ाई अपनी तरह लड़ता है, लोगों को वर्गीकरण करना बंद होना चाहिए कुछ खास लोग कभी कभी आम लोगों की परेशानी का कारण बन जातें है और इसके लिए ब्यूरोक्रेसी भी जिम्मेदार है लेकिन अब सूचना के अधिकार की ताकत आम आदमी के साथ है, लोग जाग रहें है, काशीनाथ सावंत के परिवार का संघर्ष इसी बात को दर्शाता है।



फिल्म में समस्याओं से उलझते परिवार के बीच छोटी छोटी बातों के बीच बेहतर हॉस्य के पुट को लेकर अपनी सोच पर प्रकाश डालें?



हास्य एक ताकत देता है और अंतमर्न में जो समस्या है उसे कैसे सुलझाना ही इसमें भी मदद करता है, मुश्किल समय में मुस्कराना बड़े लाभ का सौदा होता है।



आप की मराठी फिल्म दोघी की कहानी के आधार पर लाघा चुनरी में दाग का निमार्ण हुआ था दोनों के फिल्मांकन को लेकर आप क्या सोचते है?



देखिए फिल्म की कहानी लेने से पहले यशराज फिल्मस ने हमसें सहमति ली थी। हमनें कहानी के फिल्मांकन के समय सच कहने का पूरा प्रयास किया वह भी बिना कुछ बोल्ड दिखाए लेकिन जिस बात को हम नहीं दिखाना चाहतें थे उसे हिन्दी फिल्म में खूब दिखाया गया और इस बात से मैं बेहद खफा भी हूं।



रियलिस्टिक सिनेमा के आज के दौर में सेंसरबोर्ड की भूमिका को लेकर आप क्या सोचतें है?



सेंसरबोर्ड नहीं हो तो अच्छा है, कुछ मुटठी भर लोगों को सही और गलत चुनने का हक नहीं होना चाहिए? कुछ निर्देशक बाजारवाद के नाम पर बोल्डनेस को दिखाते है और इसे जनता की डिमांड बताते है, यह भी उतना ही गलत है, फिल्मकारों को भी अपना काम पूरी गंभीरता के साथ्र करना होगा।



पुणो फिल्म संस्थान में विजड्म ट्री को लेकर छात्रों में खासा लगाव होता है, आप वहां के छात्र रहें है, इस विजड्म ट्री से अपने रिश्ते को कैसे देखते है?



विजडम ट्री से मेरा भी लगाव रहा है,दुनियां को देखने का नजरिया और अलग तरह की फिल्म बनाने की प्रेरणा जो सामान्य से सामान्य आदमी की कहानी भी कह सकती हो की प्रेरणा मुझे यहीं मिली।



सुनील संथानम:एक परिचय



सुनील सुकथांकर ने सुमित्रा भावे के साथ मिलकर आठ फीचर फिल्मों का निमार्ण किया है जिसमें दोघी, जिंदगी जिंदाबाद, वास्तुपुरुष, बेवक्त बारिश प्रमुख है। एक कप चाय इसी कड़ी में नौंवी फिल्म है। अभी तक सुनील की फिल्मों को तीन इंटरनेशनल अवार्ड और सिक्स इंटरनेशनल अवार्ड मिल चुके है।



एक कप चाय: यह एक ऐसे परिवार की कहानी है जिसका मुखिया काशीनाथ सांवत स्टेट ट्रासपोर्ट में बस कंडक्टर है। सावंत के परिवार को सरकारी अफसरों की भूल के कारण हजारों रुपए का बिजली का बिल भेज दिया जाता है जिसके बाद सावंत का परिवार कई तरह की परेशानियों में पड़ जाता है लेकिन अपने ड्राइवर मित्र और समाजिक कार्यकर्ता के बल पर सांवत का परिवार अपने आत्म सम्मान की लड़ाई खुद लड़ता है और विजयी होता है।

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