धान के कटोरे की पहचान पर खतरा
रायपुर । विश्व जलवायु में परिवर्तन का असर छत्तीसगढ़ की खेती पर हो रहा है। डेढ़ दशक के अंदर बियासी पद्धति के धान का रकबा 15.80 लाख हेक्टेयर से कम होकर 12.53 लाख हेक्टेयर पर सिमट गया है। प्रदेश में एक सदी में बारिश का ग्राफ करीब 30 फीसदी गिरा है। ऐसे में धान के कटोरे के रूप में बनी छत्तीसगढ़ की पहचान पर ही खतरा मंडराने लगेगा। जलवायु में लगातार बदलाव से धान के कटोरे की पहचान को खतरा हो गया है।
मौसम और कृषि वैज्ञानिकों ने विश्लेषण में पाया कि 10-15 सालों से मानसून केरल में जल्दी पहुंच रहा है, लेकिन छत्तीसगढ़ में 8 से 12 दिन लेट हो रहा है। पहले यह 10 जून तक पहुंच जाता जो अब 18 जून के बाद ही दस्तक दे रहा है। बारिश भी औसत से कम हो रही है।मौसम के बदलाव की वजह से गर्मी की मई-जून और अक्टूबर में होने वाली बारिश लगभग खत्म हो गई है। अक्टूबर धान के पकने का उपयुक्त समय होता है। बारिश नहीं होने से पैदावार पर विपरीत असर पड़ रहा है। यही वजह है कि लंबी अवधि वाली परंपरागत धान की किस्में सफरी, गुरमुटिया, मासूरी का रकबा 3.27 लाख हेक्टेयर सिमट गया है। किसान अब महामाया, एचएमटी, 1010 जैसी कम अवधि की किस्में लगा रहे हैं। सरकार भी यही सलाह दे रही है।
गेहूं की पैदावार घटी -
विज्ञानियों के अनुसार नवंबर-दिसंबर में तापमान बढ़ने से गेहूं की ग्रोथ रेट भी गिरी है। इसका रकबा कम होने के साथ ही शिफ्ट हुआ है। दक्षिणी जोन रायपुर जिले में गेहूं की फसल 20 से 30 प्रतिशत किसान लेते थे। अब यह इलाका बदलकर उत्तर जोन बिलासपुर शिफ्ट हो गया है। जनवरी में लगातार तापमान बढ़ रहा है। बस्तर में गेहूं की खेती 5 प्रतिशत और रायपुर जिले के मैदानी इलाकों में 3 प्रतिशत कम हो गई है। गेहूं की जगह चने की खेती ने ली है।
अकरस में कमी, फसलों पर असर
इसकी वजह से मई-जून में गर्मी में होने वाली बारिश अब नहीं हो रही। इससे ‘अकरस’ में कमी आ गई है। ‘अकरस’ यानी गर्मी में खेतों की जुताई होने से खरपतवार और कीड़े जमीन से ऊपर आ जाते और मर जाते थे। अब खेतों में खरपतवार और कीड़ों का खतरा ज्यादा रहने लगा है।
खतरों से निपटने के उपाय शुरू -
खतरे से निपटने छत्तीसगढ़ में फसल विकेंद्रीकरण का काम शुरू हो गया है। पैदावार की कमी को पूरा करने के लिए दो फसलें लेने की तैयारी की जा रही है। स्थानीय जलवायु परिवर्तन पर मौसम वैज्ञानिकों ने मंथन शुरू किया है।विश्व जलवायु सम्मलेन में इंदिरा गांधी कृषि विवि के मौसम वैज्ञानिक डा. एएसआरएएस शास्त्री ने ‘स्थानीय जलवायु परिवर्तन, छत्तीसगढ़ दृष्टिगत परिणाम’ में इसका जिक्र किया। योजना आयोग के उपाध्यक्ष डीएन तिवारी ने बताया कि पानी की कमी दूर करने एनीकेट बनाए जा रहे हैं। पिछली दफे सेकेंड क्राप 16 प्रतिशत ली गई थी। इसमें बढ़ोतरी की जाएगी।
100 साल में 30 फीसदी बारिश कम -
इंदिरा गांधी कृषि विवि के मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार प्रदेश में 100 साल में 30 से 35 प्रतिशत तक बारिश में कमी आई है। इसका आधार राज्य के 80 शहरों और नगरों का अध्ययन है। महासमुंद, भाटापारा, देवभोग में 30 से 35 फीसदी पानी कम गिर रहा है। रायपुर और कोरिया जिले में 20 से 25 प्रतिशत और शेष जिलों में 15 से 20 प्रतिशत की कमी आंकी गई है। बस्तर संभाग में 5 से 10 और बिलासपुर व सरगुजा संभागों में 10-15 फीसदी वर्षा कम हो गई है। केवल राजनांदगांव ही ऐसा जिला है जहां कुछ इलाकों में 5 प्रतिशत वर्षा बढ़ी है।‘इस साल प्रदेश सहित देश में औसत से 23 फीसदी कम पानी गिरा है। जलवायु में बदलाव धान की खेती के अनुकूल नहीं है। पैदावार बनाए रखने खेती के तरीकों में बदलाव और वाटर हार्वेस्टिंग को बढ़ावा देने की बेहद जरूरत है।’ डॉ. एएसआरएएस शास्त्री, मौसम वैज्ञानिक
खतरों से निपटने के उपाय
खतरे से निपटने छत्तीसगढ़ में फसल विकेंद्रीकरण का काम शुरू हो गया है। पैदावार की कमी को पूरा करने के लिए दो फसलें लेने की तैयारी की जा रही है। स्थानीय जलवायु परिवर्तन पर मौसम वैज्ञानिकों ने मंथन शुरू किया है।विश्व जलवायु सम्मलेन में इंदिरा गांधी कृषि विवि के मौसम वैज्ञानिक डा. एएसआरएएस शास्त्री ने ‘स्थानीय जलवायु परिवर्तन, छत्तीसगढ़ दृष्टिगत परिणाम’ में इसका जिक्र किया। योजना आयोग के उपाध्यक्ष डीएन तिवारी ने बताया कि पानी की कमी दूर करने एनीकेट बनाए जा रहे हैं। पिछली दफे सेकेंड क्राप 16 प्रतिशत ली गई थी। इसमें बढ़ोतरी की जाएगी।











