उनकी आगे पढ़ने की मंशा थी, ताकि किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में अच्छी नौकरी मिल सके। धनवंत कातंबे औरंगाबाद के एक इंस्टीट्यूट में मैनेजमेंट की पढ़ाई कर रहा था। सुधीर फर्डे ने डॉ. पंजाब राव यूनिवर्सिटी से हाल ही में स्नातक किया है। दोनों की उम्र 22 वर्ष है और वे स्नातक करने के बाद कोई ऐसा कोर्स करना चाहते थे जो उन्हें छह अंकों वाले वेतन वर्ग में पहुंचा दे। दोनों ही मध्यमवर्गीय परिवार से आते हैं और उनके पास अपनी आगे की पढ़ाई जारी रखने के लिए पर्याप्त पैसा नहीं था। हालांकि उनका शैक्षणिक रिकॉर्ड बेहतर रहा है।
दोनों महाराष्ट्र के गोंदिया जिले से आते हैं। उच्च शिक्षा के अपने सपने को पूरा करने के लिए उनके दिमाग में शीघ्र पैसा कमाने का एक अनूठा विचार आया। उन्होंने सुना था कि चीते की खाल बेचने से काफी पैसा मिल सकता है, जिससे वे अपने मैनेजमेंट प्रोग्राम की फीस चुका सकते हैं। अपने एक मित्र (जिसका नक्सलियों से संपर्क था) के जरिए उन्होंने 30,000 रुपए में चीते की खाल खरीद ली।
नक्सलियों ने उनसे मुंबई के निकट कल्याण में एक व्यक्ति से मिलने के लिए कहा जो उन्हें इसकी मौजूदा बाजार कीमत देने वाला था। बाजार में इसकी कीमत 25 लाख रुपए थी। बगैर यह समझे कि इसका नतीजा क्या हो सकता है, दोनों इस बेशकीमती सामान को बेचने की खातिर कल्याण के लिए निकल पड़े। रास्ते में फर्डे महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग की परीक्षा के सपने बुनने लगा तो कादंबे अपने उस कर्ज को चुकाने के बारे में सोचने लगा, जो उसने अपनी मैनेजमेंट की पढ़ाई के लिए लिया था।
वास्तव में फर्डे हमेशा से एक पुलिस अधिकारी बनना चाहता था। कल्याण पहुंचने पर पुलिस ने मुखबिर की सूचना पर उन दोनों को धर दबोचा।
आरोप सिद्ध होने पर दोनों को कम से कम तीन साल से लेकर सात साल तक जेल में गुजारने पड़ सकते हैं। गौरतलब है कि इस अवधि में वे अपने पोस्ट ग्रेजुएशन तथा मैनेजमेंट की पढ़ाई कर सकते थे।
फंडा यह है कि.
हमारा सभ्य समाज गलत हरकतों को स्वीकार नहीं करता। ‘इसकी टोपी उसके सिर’ जैसी बात जीवन में हर कहीं लागू नहीं होती। सफलता के लिए कोई शॉर्टकट नहीं होता।