चंडीगढ़. जमीन का मुआवजा मार्केट रेट पर कैसे दिया जाए? इस सवाल का जवाब प्रशासन ने होम मिनिस्ट्री पर छोड़ दिया है। बेबसी जताते हुए प्रशासन ने कहा है कि वह लैंड एक्विजेशन एक्ट के प्रावधानों से बंधा है और उसी के नियमों के तहत मुआवजा तय किया गया है। प्रशासन के पास इस एक्ट के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं जिसके चलते जमीन के मालिकों को मार्केट रेट पर मुआवजा दिया जा सके।
अगर इससे बेहतर विकल्प मिनिस्ट्री सुझा दे तो प्रशासन इसे खुशी से लागू करेगा। यह भी कहा गया है कि मुआवजा बढ़ाने के लिए चंडीगढ़ के प्रशासक जनरल (रिटायर्ड) एस एफ रोड्रिग्स की ओर से होम मिनिस्टर को 28 जनवरी 2009 को एक चिट्ठी लिखी गई थी जिसमें स्पष्ट किया गया था कि स्थानीय सांसद और केन्द्रीय मंत्री पवन कुमार बंसल जमीन के मालिकों को 4 करोड़ रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से मुआवजा दिलाने की वकालत कर रहे हैं। मिनिस्ट्री की ओर से अभी तक इस बारे में कोई जवाब ही नहीं दिया गया।
मेगा प्रोजेक्ट्स और जमीन की एक्विजेशन पर होम मिनिस्ट्री की ओर से करवाए गए स्पेशल ऑडिट के जवाब में प्रशासन यह भी कहा है कि मुआवजा देने में लैंड एक्विजेशन एक्ट से बाहर जाकर कोई फैसला केन्द्र के स्तर पर ही किया जा सकता है। एक्ट में यह प्रावधान है कि अगर कोई व्यक्ति मुआवजे से संतुष्ट नहीं है तो वह इसे जिला अदालत में चुनौती दे सकता है।
प्रशासन को यह अधिकार नहीं है कि लैंड एक्विजेशन अफसर की ओर से सुनाए गए अवार्ड को किसी स्तर पर रिव्यू किया जा सके। होम मिनिस्ट्री की ऑडिट रिपोर्ट में जमीन के मालिकों को कम मुआवजा देने पर ऐतराज जताया गया था और यह कहा गया था कि चंडीगढ़ प्रशासन ने नेशनल रिहैब्लिटेशन पॉलिसी को ठीक से लागू नहीं किया। ऑडिट का सुझाव था कि मार्केट रेट पर जमीन का मुआवजा दिया जाना चाहिए। वह रेट जिस पर खरीदार और जमीन का मालिक दोनों सहमत हों। जैसा की पंजाब सरकार कर रही है। इससे जमीन के मालिकों को पर्याप्त मुआवजा मिल पाएगा।
प्रोजेक्ट की तुलना ठीक नहीं
रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि प्रशासन ने आईटी पार्क में हैबिटेशन प्रोजेक्ट के तहत कौड़ियों के भाव 123.79 जमीन अलॉट की है जबकि इसी दौरान नगर निगम ने केवल पांच एकड़ जमीन 108 करोड़ रुपये में बेची। प्रशासन की ओर से तैयार किए गए जवाब में कहा गया है कि नगर निगम के हाउसिंग प्रोजेक्ट और आईटी पार्क के हैबिटेशन प्रोजेक्ट में तुलना करना तर्कसंगत नहीं है।
निगम ने चंडीगढ़—कालका हाईवे पर पांच एकड़ का प्लॉट बेचा है जबकि हाउसिंग बोर्ड ने आईटी पार्क में। इसकी लोकेशन हाईवे से कहीं दूर है। दूसरा 123.79 एकड़ में से केवल 19.81 एकड़ जमीन हाउसिंग और 4.33 एकड़ कमर्शियल है बाकी जमीन सड़कों, पार्को सहित साझा सुविधाओं के लिए छोड़ी गई है। प्रशासन ने ओपन ऑक्शन से यह जमीन बेची। पहली बोली 821 करोड़ रुपये की थी और दूसरी 567 करोड़ रुपये की। जमीन की रिजर्व प्राइस 375 करोड़ रुपये तय की गई थी।
रिकॉर्ड देखकर दिया काम
एसबीआई कैप को बतौर कंसल्टेंट नियुक्त करने पर उठाए गए सवालों के जवाब में प्रशासन ने कहा है कि यह एक सरकारी कंपनी है और नियमों के तहत ही इसे कंसल्टेंट नियुक्त किया गया। केन्द्र सरकार, उसके उपक्रम और कई राज्य सरकारें विभिन्न प्रोजेक्ट्स के लिए इस कंपनी की सेवाएं ले चुकी हैं। कंपनी के ट्रैक रिकॉर्ड को ही ध्यान में रखते हुए उसे कंसल्टेंट नियुक्त किया गया।
प्रोजेक्ट से सोशल इंजीनियरिंग की शुरुआत
आईटी पार्क हैबिटेशन प्रोजेक्ट की वकालत करते हुए प्रशासन ने कहा है कि इस प्रोजेक्ट से सोशल इंजीनियरिंग की एक नई शुरुआत हुई। चंडीगढ़ को स्लम फ्री सिटी बनाने के लिए 1200 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं जिसका बड़ा हिस्सा आईटी पार्क के हाउसिंग प्रोजेक्ट से आना है। प्रशासन न केवल अवैध कब्जों से 200 एकड़ जमीन मुक्त करवा रहा है बल्कि 25 हजार परिवारों को मकान भी उपलब्ध करवा रहा है।