स्मृति विशेषः आधुनिक सभ्य समाज में रहने वाले हम-आप सभी सोचते हैं कि आदिम जातियां बौद्धिक रूप से कल्पनाशील नहीं होतीं और जीवन व धर्म के प्रति उनका रुख रोटी, कपड़ा तथा मकान की आधारभूत जरूरत की संतुष्टि से तय होता है।
इस मिथकों को तोड़ने वाले चिंतक क्लॉड लेवी स्ट्रॉस का गत शुक्रवार पेरिस के अपने घर में दिल की धड़कन बंद होने से सौ साल की आयु में निधन हो गया। उनके बेटे लॉरेंट ने बताया कि लेवी स्ट्रॉस अपनी मौत को निजी रखना चाहते थे। इसीलिए उनके निधन का समाचार मंगलवार को सार्वजनिक किया गया और इसी दिन उन्हें दफना दिया गया।
आधुनिक एंथ्रोपोलॉजी (मानव जातियों का अध्ययन) के पितामह लेवी स्ट्रॉस का जन्म 28 नवंबर 1908 को ब्रसेल्स में हुआ था। उन्होंने पेरिस में कानून व दर्शनशास्त्र की पढ़ाई की और सेकंडरी स्कूल में पढ़ाने लगे। स्ट्रॉस ने ब्राजील के अमेजन के वर्षा वनों में रहने वाले आदिवासियों का अध्ययन किया।
उनकी पुस्तक ‘त्रिस्तेस त्रापिक्स’ है तो संस्मरण, लेकिन इसमें समाजशास्त्र, भूगोल, इतिहास, संगीत और साहित्य को जोड़ने वाले उनके दार्शनिक विचारों की प्रखरता देखने को मिलती है। इस पुस्तक में ब्राजील के अलावा भारत का भी जिक्र है। उन्होंने पाया कि आदिम प्रजातियां सिर्फ रोटी, कपड़ा, मकान तक सीमित नहीं हैं।
इनके अजीब से मिथकों में उन्होंने तर्क शक्ति की भी नफासत पाई। अपनी एक अन्य किताब ‘सेवेज माइंड’ में उन्होंने कहा कि आदिम प्रजातियों में भी वस्तुनिष्ट ज्ञान प्राप्त करने की एक प्यास होती है।
विविधता पूर्ण संस्कृतियों की जगह वे दुनियाभर में एक जैसे ‘मास कल्चर’ के फैलाव को लेकर चिंतित थे। जिस ‘स्ट्रक्चरलिज्म’ अपने सिद्धांत में उन्होंने पाया कि प्राचीन पौराणिक कथाओं व मिथकों में ऐसे तत्व होते हैं जो एक-दूसरे के विरोधाभासी प्रतीत होते हैं और ऐसे तत्व भी होते हैं जो उनके विरोधाभास का समाधान बताते हैं। आदिम प्रजातियों, मिथकों व पौराणिक कथाओं वाले भारत के लिए लेवी स्ट्रॉस का महत्व इसलिए हैं कि हमारे यहां भी सांस्कृतिक विविधता खतरे में है।
फिर अपने वनवासी व आदिवासियों के बारे में भी हमारी कुछ वैसी ही धारणा है जिसे स्ट्रॉस ने तोड़ा है। नक्सलवाद की समस्या का हल खोजने में स्ट्रॉस की किताबें शायद हमें कोई राह दिखा सकें।