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महंगाई : सरकार ने स्वीकारी लाचारी
संजय मिश्र Thursday, November 05, 2009 06:25 [IST]  

नई दिल्ली. महंगाई की आग में झुलस रहे आम आदमी को अब इसकी आदत डाल लेनी चाहिए क्योंकि केंद्रीय वित्त और कृषि मंत्रालयों के बाद योजना आयोग ने भी खाद्यान्न की कीमतें संभालने में लाचारी जता दी है।



वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने केंद्र की बेबसी बताते हुए मंगलवार को कहा था कि महंगाई तभी कम होगी जब राज्य अपनी वितरण प्रणाली सुधार लेंगे, तो बुधवार को कृषि मंत्री शरद पवार ने एक बार फिर कहा कि नई फसल आने से पहले कीमतों पर काबू पाना सरकार के बस में नहीं। दूसरी ओर योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेकसिंह अहलुवालिया ने भी साफ कर दिया कि दाम कम करने का सरकार को कोई समाधान नजर नहीं आ रहा है।



राहत के लिए अगली फसल तक करें इंतजार



कृषि मंत्री शरद पवार ने एक बार फिर कहा कि महंगाई कम करने के मसले पर अगली फसल आने तक वे कुछ नहीं कर सकते। चीनी के आसमान छूते दाम पर पवार का कहना था कि नई चीनी का उत्पादन शुरू होने तक इसके दाम घटने की संभावना कम ही लगती है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि अगले तीन महीने तक उन्हें दाम घटने की कोई सूरत नजर नहीं आती।



उन्होंने बताया कि चावल के बुवाई क्षेत्र में 54 लाख हेक्टेयर, मोटे अनाज के 3.5 लाख हेक्टेयर, तिलहन के 16.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में कमी आई है और यह कमी उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, बिहार जैसे राज्यों में आई। इस तरह, महंगाई को लेकर यूपीए सरकार के केंद्रीय मंत्रियों में ही एक राय नहीं दिखी। केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के बयान का 24 घंटे के अंदर ही केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने खंडन कर दिया है।



आर्थिक संपादकों के सम्मेलन में मुखर्जी ने मंगलवार को महंगाई की आंच से आम आदमी को बचाने की जिम्मेदारी राज्यों पर थोप दी थी, तो बुधवार को पवार ने साफ तौर पर कहा कि अप्रैल तक आम आदमी को महंगाई की आग में झुलसना ही होगा। रबी की फसल आने के बाद महंगाई से राहत मिल सकती है।



कृषि मंत्री ने कहा कि मांग और आपूर्ति का संतुलन साधने की पूरी कोशिश के बावजूद महंगाई नहीं कम हो रही है। कृषि मंत्री पवार ने चीनी से लेकर चावल तक के मांग और आपूर्ति के अंतर को बताकर महंगाई बढ़ने के कारण भी गिनाए और यह भी बताया कि सरकार की कोशिश के बाद भी खाद्य पदार्थो की कीमतों में कोई कमी क्यों नहीं आ रही है।



उन्होंने कहा कि सूखे और बाढ़ दोनों ही महंगाई को बढ़ाने का काम किया है। सूखे के कारण खरीफ सीजन में चावल और तिलहन दोनों का रकबा घट गया है। उधर, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में बाढ़ के कारण खरीफ की बची-खुची फसल भी चौपट हो गई है।



सस्ते का कोई उपाय नहीं : मोंटेक



योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक¨सह अहलूवालिया के मुताबिक खाद्यान्न कीमतें काबू में करना बेहद कठिन है। केंद्र की यूपीए सरकार कीमतें काबू में करने के लिए तमाम उपाय कर रही है, लेकिन कोई आसान समाधान हमारे सामने नहीं है।



श्री अहलूवालिया ने कहा कि थोक मूल्य सूचकांक और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक किस स्थिति में है, इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता। लब्बोलुआब यह है कि कीमतों को काबू में करना बेहद मुश्किल हो गया है, सस्ते का कोई उपाय नहीं है।

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