लाहौल-स्पीति का अनूठा संसार बनेगा भोपाल की शान
कुल्लू. बर्फबारी के दौरान 6 माह के लिए लाहौल स्पीति के वाशिंदे शेष विश्व से कटे रहते हैं। बर्फ के रेगिस्तान में कैद होने के बाद कोई हिम्मत वाला आदमी ही इस जिले में कठिन जीवन गुजर-बसर कर सकता है। इस दौरान यहां के बाशिंदे क्या करते हैं, इसकी किसी को जानकारी नहीं होती। हां इतना जरूर पता होता है कि लाहौल स्पीति शेष विश्व से 6 माह के लिए अलग-थलग पड़ गया है।
यहां के वाशिंदों द्वारा तैयार की हुई वस्तुएं अब मानव संसाधन मंत्रालय भोपाल की धरोहर बनने जा रही है। वस्तुओं से ही बर्फ के रेगिस्तान में रहने वाले वाशिंदों की जीजिभिषा भी झलकेगी। इसके लिए भोपाल मंत्रालय की ओर से जिले की लायूल सुर संगम समाज सेवी संस्था को 24 अक्टूबर को पत्र आया है। जिसमें उन्होंने यहां की पुरातन वस्तुआंे व बेजोड़ कलाकृतियों को संग्रहालय में रखने की पेशकश रखी है।
ये वस्तुएं खो गई चकाचौंध में
लायूल सुर संगम ने ऐसी सैकड़ों वस्तुओं को सहेज कर रखा है जो चकाचौंध की बयार में खो गई है। भोपाल भेजने से पूर्व इसके अंतिम दर्शन कुल्लू में दिखाई देंगे। 7 नवंबर को लाल चंद प्रार्थी कलाकेंद्र में इसकी प्रदर्शनी होगी। आज के लोग इन्हें पहचानते तक भी नहीं हैं। जानवरों की खाल से बनने वाली विस्तर लकड़ी, पत्थर के बर्तन, बिना बट्टों का तराजू, त्यौहार में उपयोग के मुखौटे तथा पुरातन शैली में बने लाहौल के घरों के दशकों पूर्व के छायाचित्र मौजूद रहेंगे। इनकी संख्या एक सौ के करीब है और यह सभी जिले के अंदर ही तैयार किए जाते हैं।
अपने ही संसार में रहते हैं मग्न
यहां के लोग बर्फ के दौरान अपने ही संसार में मग्न रहते हैं। जिससे ये लोग ऐसी वस्तुएं निर्मित करते थे जो अब काफी प्राचीन हो चुकी है। नई पीढ़ी उन वस्तुओं को हैरत भरी निगाहें से देखती है। सुर संगम संस्था के सांस्कृतिक कार्यक्रम के निदेशक किशन हंस का कहना है कि लाहौल क्षेत्र में ही ऐसी वस्तुओं को तैयार किया जाता रहा है जिन्हें दूसरी जगहों से लाना पड़ता था लेकिन बर्फबारी के दौरान उन्हें यहां पहुंचाना बेहद मुश्किल होता था। जिन्हें यहां के लोगों ने खुद ही इजाद कर दिया है।
लाहौल की दुर्लभ वस्तुएं 11 नवंबर के बाद भोपाल की शान बनेगी। इंदिरा गांधी मानव संसाधन मंत्रालय के लिए इनका बुलावा आया है। जिंदा रहने के लिए लोगों ने कई ऐसी वस्तुएं तैयार की है जो अपने आप में अनूठी और बेजोड़ है। इन वस्तुओं से यहां के लोगों का रहन-सहन, पहरावा तथा खान-पान के बर्तनों का खाका भी दृष्टिगोचर होता है। पुरातन शैली के घरों से यह भली-भांति जाना जा सकता है कि कई फुट बर्फ पड़ने के बाद भी उनके घर उन्हें कैसे जिंदा रखते हैं।












