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Friday, November 06, 2009 01:24 [IST]  

danik bhaskarहास्य फिल्मों का गर्म बाजार

Jaiprakash Chokse

इन दिनों मुंबई के फिल्मकारों को विश्वास हो चुका है कि इस दौर का दर्शक केवल हास्य फिल्में देखना चाहता है। सफलता से संचालित उनकी सोच कोयल के कूकने से बसंत की कल्पना कर लेती है। वे चंद सफल हास्य फिल्मों को उदाहरण बनाकर पेश करते हैं और दर्जनों असफल हास्य फिल्मों को अनदेखा कर जाते हैं।



भेड़िया धसान इसी को कहते हैं, दो-चार भेड़ों के पीछे सारी भेड़ें चलने लगती हैं। मनुष्य भी भेड़ों की तरह अपनी स्वतंत्र बुद्धि, तर्क को इस्तेमाल नहीं करके हमेशा हर क्षेत्र में किसी के पीछे चलने को तत्पर रहता है। हमारा यही जन्मना आलस्य और पलायन की आदत के कारण अयोग्य नेता, दुनियादार साधु-संत और खोखले भाषणबाज लोगों की चांदी हो जाती है।



हमारे सिनेमा में धार्मिक आख्यानों के दशक के बाद सामाजिक फिल्मों के दौर में व्यंग्य के समावेश के साथ हास्य ने प्रवेश किया। शशधर मुखर्जी के फामरूला दौर में हर किस्म की फिल्म में एक अंश हास्य का वैसे ही डाला गया है जैसे चतुर गृहिणी भोजन बनाते समय छौंक लगाती है।



पहली विशुद्ध हास्य फिल्म जिसे भूलना मुमकिन नहीं है, किशोर कुमार की ‘चलती का नाम गाड़ी’ है, दूसरी मेहमूद की ‘पड़ोसन’, तीसरी गुलजार की ‘अंगूर’, चौथी ऋषिकेश मुखर्जी की ‘चुपके-चुपके’ व ‘गोलमाल’, सई परांजपे की ‘चश्मे बद्दूर’ और राजकुमार संतोषी की ‘अंदाज अपना अपना’ है।



डेविड धवन की ‘पार्टनर’, अनीस बज्मी की ‘नो एंट्री’, प्रियदर्शन की ‘हेराफेरी’ सफल हास्य फिल्में हैं, परंतु ‘भेजा फ्राय’ को महज हास्य फिल्म नहीं कहा जा सकता। वह व्यंग्य है।



हास्य फिल्मों की भयावह श्रेणी दादा कोडके की फिल्में हैं, जिनसे प्ररेणा लेकर कादर खान ने बहुत सी बेहूदगी प्रस्तुत की थी। अपार प्रतिभाशाली मेहमूद ने भी काम की अधिकता के कारण हास्य के नाम पर बेहूदगी प्रस्तुत की थी। दक्षिण भारतीय फिल्मों में मूल कथा के समानांतर एक हास्य कथा भी दौड़ती थी और दोनों कहीं भी नहीं मिलते थे।



क्या सचमुच आज का दर्शक केवल हास्य फिल्में पसंद करता है? हर कालखंड में युवा दर्शक की पहली पसंद प्रेम कथाएं रही हैं। शाहरुख खान की सफलतम फिल्म ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ भी प्रेम कथा थी। इम्तियाज अली की ‘जब वी मेट’ भी प्रेम कथा है। सलमान खान को सितारा हैसियत ‘मैंने प्यार किया’ ने दिलाई। आमिर को भी ‘दिल’ और ‘राजा हिंदुस्तानी’ ने ही लाड़ला बनाया।



आज के दर्शकों को हास्य फिल्में ज्यादा पसंद आना यह साबित नहीं करता कि वह प्रेमल हृदय नहीं हैं। बाजार की ताकतों ने एक अत्यंत गहन प्रतिस्पर्धा का वातावरण बनाया है और युवा वर्ग नए दबाव और तनाव को झेल रहा है। अत: उसके लिए मनोरंजन का सीमित अर्थ है हास्य। शायद यही कारण है कि छोटे परदे पर भी कॉमेडी शो बहुत सफल हो रहे हैं।



बात और गहरी है, यश चोपड़ा की ‘वीर जारा’ उतनी सफल नहीं रही जितनी उम्मीद और फिल्म की गुणवत्ता थी। अनेक युवा लोगों को इस फिल्म में नायक-नायिका का दशकों बाद बुढ़ापे में मिलना पसंद नहीं आया। अगर नायक को पांच वर्ष की सजा होती तो वे जवानी में मिल जाते। गोयाकि प्रेम का अर्थ सेक्स है। आज का दौर शरीर का दौर है। बाजार की ताकतें भी शरीर के माध्यम से चीजें बेच सकती हैं।

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