Danik Bhaskar Logo
| 27 Editions | 9 States

Investor
Friday, November 06, 2009 02:36 [IST]  

danik bhaskarचडियाला में गिरा बम का टुकड़ा

मनोज राजपूत

bombडेराबस्सी. चडियाला गांव में बुधवार को एक घर पर बम का टुकड़ा गिरने से दहशत है। बम का यह टुकड़ा दप्पर आयुध डिपो का बताया जा रहा है। इस गांव में पहले भी कई बार ऐसा हो चुका है। इससे जानमाल की क्षति हो चुकी है। लोगों का आरोप है कि विस्फोटक नष्ट करते समय सेना कोताही बरत रही है। ग्रामीणों ने प्रशासन से बचाव के पुख्ता इंतजाम करने की गुहार की है।



दशकों से हो रहा ऐसा



आयुध डिपो का घग्गर नदी के किनारे करीब 100 बीघा क्षेत्र में डिमॉलिशन ग्राउंड है। यहां दशकों से सेना नकारा हो चुके विस्फोटकों को नष्ट करती आ रही है। वीकेंड को छोड़ अन्य दिनों में यह कार्रवाई सुबह 10 से 12 बजे तक चलती है। ट्रकों में लाए गए विस्फोटकों को बारूद लगाकर गड्ढ़ों में रखा जाता है। नष्ट करते समय धमाकों के साथ बमों के टुकड़े आसपास खेतों में बिखर जाते हैं।



इन्हें बाद में सैनिक इकट्ठा कर वापस डिपो ले जाते हैं। बुधवार को ऐसा ही एक टुकड़ा चडियाला गांव की आबादी में तिरपाल और महिपाल के घर के आंगन में गिरा। इसका वजन 750 ग्राम बताया गया है। यह टुकड़ा जमीन में धंस गया। गनीमत यह रही कि आंगन में कोई व्यक्ति अमौजूद नहीं थे। सिर्फ तिरपाल की पत्नी कुसुम गेंहूं साफ कर रही थी। इस मैदान से गांव की दूरी आधा किलोमीटर है।



जा चुकी है जान



कुसुम के अनुसार यह बम का टुकड़ा गरम था। गांव के लोगों का कहना है कि ऐसे टुकड़े आमतौर पर खेतों में गिरते रहते हैं। कभी कभार इनकी जद में गांव आ जाता है। यह टुकड़े कई मवेशियों की जान ले चुके हैं। सात साल पहले साधु सिंह के बेटे अजीत सिंह की मौत हो चुकी है।



बच्चे उठा लाते हैं ‘मौत का सामान’



11 मई 2007 को सरपंच दिलबर के घर की छत पर भी कई टुकड़े गिरे थे। खेतों में गिरे टुकड़ों को उठाने की इजाजत नहीं है। यह टुकड़े फसल काटने वाली मशीनों को भी नुकसान पहुंचाते हैं। बमों के धमाकों से मकानों में दरारें आ चुकी हैं। शीशे चकनाचूर हो चुके हैं। ग्रामीणों का कहना है कि सेना के लौटने पर डिमोलिशन ग्राउंड में आसपास गांवों के गरीब परिवारों के बच्चे पहुंच जाते हैं। यह बच्चे ‘मौत का सामान’ विस्फोटक सामग्री के टुकड़े लाकर कबाड़ियों को बेच देते हैं। यहां इससे कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है।



ऐसी कोताही



ग्रामीणों का आरोप है कि विस्फोटकों को अलग-अलग की बजाय एक ही बड़े मगर अपेक्षाकृत कम गहरे गड्ढ़े में रखकर नष्ट किया जाता है। उन्हें ढकने के लिए सामग्री कम होती है। इससे धमाकों का असर दूर तक पड़ता है। इनका मलवा भी काफी दूर गिरता है। यह भी आरोप है कि विस्फोटकों पर कम बारूद लगाया जाता है। लोगों ने घरों में गिरे कुछ ऐसे ही टुकड़े इस संवाददाता को भी दिखाए गए। इलाके के ग्रामीण कहते हैं कि सेना जब विस्फोटकों को नष्ट करती है तो वह लोग बच्चों और मवेशियों समेत अपने-अपने घरों में दुबक जाते हैं।



निर्धारित नियमों के तहत ही विस्फोटक नष्ट करने की कार्रवाई होती है। प्रतिदिन 10 से 15 धमाके होने का मतलब विस्फोटक एक साथ नहीं अलग-अलग गड्ढ़ों में दबाए जाते हैं। पर्याप्त मात्रा में बारूद लगाई जाती है। गड्ढ़ों की गहराई और सैंड बैग्स की संख्या कम नहीं होती। सेना की पहली प्राथमिकता लोगों की सुरक्षा है। डिस्पोज ऑफ कार्रवाई चेक की जाएगी। गांववालों से भी बातचीत होगी।



कर्नल संधू, डिप्टी कमांडेंट, दप्पर आयुध डिपो

  share
apne vichaar
post a comment
name:
email:
select your language:     Hindi Roman     Hindi Phonetic     English
comment:
code: