काम नहीं तो भत्ता नहीं, अभी नहीं
चंडीगढ़. शोर शराबे और बहिर्गमनों के कारण आमतौर पर बिना किसी काम के खत्म होने वाली विधानसभा की बैठकों के लिए विधायकों को मिलने वाले भत्ते बंद होने चाहिए। ये सिफारिश चार साल पहले 13वीं ऑल इंडिया व्हिप्स कांफ्रेंस ने की थी।
दो बार हुई है सिफारिश
इसे लोकसभा और राज्य विधानसभाओं से लागू करने को कहा गया था। चार साल बीत गए सिफारिशों को अमली जामा नहीं पहनाया गया है। यही नहीं 14वीं ऑल इंडिया व्हिप्स कांफ्रेंस में भी इन सिफारिशों को जल्द से जल्द लागू करने की नये सिरे से सिफारिश की गई। दरअसल यह फैसला विधानसभा सत्रों में विधायकों की घटती रूचि का देखते हुए किया गया।
विधायक सत्रों की संख्या बढ़ाने की तो लगातार बातें करते हैं लेकिन चल रहे सत्रों की बहसों में शामिल नहीं होते। दरअसल अपने पैसों को जाता देखना ज्यादातर विधायकों को गवारा नहीं है और यही वजह है कि अभी तक ये सिफारिशें विधानसभा में नहीं रखी गईं। विधानसभा के स्पीकर निर्मल सिंह काहलों का कहना है कि ये केवल सिफारिशें हैं जिन्हें मानना अनिवार्य नहीं है।
कुछ संजीदा विधायक सिफारिशों को लागू करने के लिए राजी भी हैं। विधानसभा की बहस में सक्रियता से भाग लेने वाले कांग्रेसी विधायक सुनील जाखड़ और आम लोगों से जुड़े मुद्दों को उठाने वाले निर्दलीय विधायक अजीत ¨सह शांत का कहना है कि काम नहीं तो भत्ता नहीं को तुरंत लागू किया जाना चाहिए। शांत की राय में तो प्रश्न लगाकर उसी दिन जानबूझकर गायब रहने वाले विधायकों को भी भत्ता नहीं मिलना चाहिए। वे चाहते हैं कि ये सिफारिशें केवल विधानसभा पर ही नहीं लोकसभा में लागू होनी चाहिए।
बैठकें बढ़ाने के लिए हो संविधान में संशोधन
विधानसभा सत्रों की बैठकें बढ़ाने के लिए संविधान की धारा 174 में संशोधन की भी सिफारिश इन कांफ्रेंसों में की गई है। हालांकि पंजाब विधानसभा के कामकाज को चलाने के लिए बने नियम 14 ए में 40 बैठकें किए जाने का प्रावधान है लेकिन पिछले 12 सालों के विधानसभा के इतिहास पर यदि नजर मारी जाए तो किसी भी साल में इससे आधे का आंकड़ा भी छुआ नहीं जा सका है।
सिफारिश की गई कि संविधान में ही संशोधन करके कम से कम बैठकों का एक आंकड़ा तय किया जाए। ऐसा नहीं है कि अकाली सरकार में सत्र छोटे रखे जा रहे हैं, पिछली कांग्रेस की सरकार का हाल भी यही था। विपक्ष ही सत्र बढ़ाने का शोर मचाता है।











