छतरपुर. ग्राम करौला के हुसैन अली के मन में अल्लाह और ईश्वर के लिए बराबर आस्था है। उसके दिमाग में कुरान शरीफ की आयातें हैं तो दिल में महावीर हनुमान बसे हैं। वह अपने कर्म के साथ इबादत और भक्ति को रोजाना बराबर समय देते हैं। दारुल उलेमाओं के वंदेमातरम गायन को लेकर जारी फतवे के बीच हुसैन का बंदगी हर किसी के लिए सबक है।
गरौली के समीप धसान नदी के किनारे बसे टीकमगढ़ जिला के ग्राम करौला में हुसैन अली (50) बीते 35 साल से पांच वक्त की नमाज और शाम के वक्त गांव की चौपाल पर सुंदरकांड का पाठ करते आ रहे हैं। पेशे से किसान हुसैन अली बहुत ज्यादा तो नहीं पढ़े हैं लेकिन इस्लाम और हिंदू दोनों धर्मो में समान आस्था होने के कारण नमाज के साथ-साथ सुंदरकांड तथा रामचरित मानस का पाठ करते हैं।
उनकी दिनचर्या में शाम के वक्त गांव की चौपाल पर बैठकर सुंदरकांड का पाठ करना शामिल है। करौला के मुन्नाराजा बताते हैं कि हुसैन अली के मन में न तो धार्मिक भेदभाव है और न ही किसी प्रकार का सामाजिक अंतर है। उनका कहना है कि हम लोग शाम के समय चौपाल पर पहुंचने में देर कर जाएं लेकिन ऐसा कभी नहीं होता कि हुसैन अली चौपाल पर सुंदरकांड पढ़ने न पहुंचें।
करौला के आस-पास गौना, आलमपुरा, गरली सहित किसी भी गांव में अगर अखंड रामायण पाठ होता है तो हुसैन अली को रामचरित मानस पढ़ने जरूर बुलाया जाता है। रामचरित मानस और सुंदरकांड का पाठ करने वाले हुसैन अली इस्लाम धर्म से भी विमुख नहीं हैं। वे गांव में रहकर भी पांच वक्त की नमाज रोजाना अदा करते हैं।
बचपन में जागा था शौक
हुसैन अली ने बताया कि जब भी गांव में अखंड रामायण बैठती थी तो उनके पिताजी जरूर ले जाया करते थे। जब लोग रामचरित मानस को सस्वर पढ़ा करते थे तो सुनने में बड़ा आनंद आता था। चूंकि गांव में हिंदू मुसलमान का भेदभाव नहीं था इसलिए धीरे-धीरे वे भी रामचरित मानस पढ़ने की कोशिश करने लगे।
पढ़ाई छोड़ने के बाद हुसैन का पढ़ने का शौक खत्म नहीं हुआ। गांव में और कोई पुस्तक नहीं मिलती थी इसलिए दोस्तों से रामचरित मानस मांगकर पढ़ना शुरू कर दिया। इसके बाद वह पलेरा से रामचरित खरीदकर लाए। यह धार्मिक पुस्तक बेहद पसंद आने पर बार-बार पढ़ी और फिर तो अपने रोजाना की जिंदगी हिस्सा बना लिया। हुसैन अली कहते हैं कि उन्हें जितनी आस्था अल्लाह में है उतनी ही श्रद्घा हनुमान जी में रखते हैं।